Similarities in the poetry of Surdas and Tulsidas| सूरदास और तुलसीदास के काव्य में समानता
भक्ति काल को हिंदी साहित्य का स्वर्ण युग कहा जाता है भक्ति काल का आरंभ 1375 विक्रम संवत से माना जाता है और इसका अंत 1700 को विक्रम संवत में हुआ। हिंदी साहित्य में भक्ति काल अत्यधिक महत्वपूर्ण है इस युग के सभी श्रेष्ठ कवि भक्ति भावना से ओतप्रोत थे। सूर, तुलसी, मीराबाई ,नंददास, कबीर इत्यादि इस काल के अति प्रमुख कवि थे । इस काल के कवियों ने राजाश्रय छोड़ दिया था। वे अपने भक्ति भाव में अपने आराध्य देव के प्रति जो कुछ भी उपासना में गुनगुनाते थे उसी की अभिव्यक्ति उनका काव्य है। भक्ति काल के प्रमुख कवियों में से सूर और तुलसी का सबसे महत्वपूर्ण योगदान रहा है। इनकी प्रशंसा में कहा गया है कि - सूर सूर तुलसी ससि , उड्डगन केशवदास । अब के कवि खद्योत सम , जहं-तहं करत प्रकास ।। इसका अर्थ है कि हिंदी साहित्य आकाश में सूर, सूर्य के समान, तुलसी चंद्रमा के समान एवं केशवदास तारा के समान आकाश में जगमगाते हैं और आजकल के कवि जुगनू के समान है जो जहां तहां प्रकाश कर पाते हैं। वैसे आज भी यह विवाद का विषय बना हुआ कि सूर सूर्य के समान है या चंद्रमा के अथवा तुलसी चंद्रमा के समान है या सूर्य के। सूरदास और तुलसीदास के काव्य में समानता - दोनों कवियों में बहुत सी समानताएं भी हैं। जैसे कि दोनों कवि भक्ति काल के उत्तम कवि हैं दोनों सगुनोपासक कवि हैं एक कृष्ण के उपासक हैं और दूसरे राम के। दोनों कवियों की भक्ति उच्च कोटि की है। दोनों ने अपने निरीक्षण के आधार पर प्राप्त ज्ञान की बातें ही व्यक्त की हैं । हिंदी साहित्य से इन दोनों को अलग कर देने पर हिंदी साहित्य खोखला हो जाएगा। दोनों विश्व स्तर के कवि हैं। प्राचीन और महत्वपूर्ण साहित्य का दोनों ने भली-भांति अध्ययन किया है।सूूर पर 'श्रीमद् भागवत् गीता' का भली-भांति प्रभाव दिखाई देता है और तुलसी दास पर 'नाना पुराण निगमागम' इत्यादि का प्रभाव दिखाई देता है।दोनों ने भाषा को चरम स्तर पर पहुंचाने का प्रयत्न किया है। अलंकारों का प्रयोग भी दोनों के काव्य में हुआ है। दोनों कवियों की भाषा ब्रज भाषा है । यद्यपि तुलसी की मुख्य भाषा अवधि है, तथापि उन्होंने गीतावली विनय पत्रिका इत्यादि ब्रज भाषा में ही लिखी है।भारतीय संस्कृति का विस्तृत रूप दोनों के काव्य में मिलता है। दोनों मुगल काल के प्रमुख कवि हैं। उस काल में देश की राजनीतिक सामाजिक एवं धार्मिक स्थिति बड़ी खराब थी। धार्मिक वैमनस्य एवं आडंबर का बोलबाला था। इनके काल में निर्गुण और सगुण और वैष्णव का मतभेद फैला हुआ था। भक्ति और ज्ञान में भी विरोध पाया जाता था। अंधविश्वास रीति रिवाज रूढ़ियों एवं संकीर्ण मानसिकता का समाज में बोलबाला था। राजा आपस में लड़ते झगड़ते रहते थे। यहां की जनता अपने आप को अनाथ महसूस करती थी। अनेक संप्रदाय, मत मतांतर विद्यमान थे। जाती- पाँती और छुआछूत का भेदभाव होता था शासक आपस में लड़ाई झगड़े करते रहते थे विलास ही थे मदांध थे उन्हें जनता की सुध नहीं थी। अपने आराध्य देव को केंद्र बिंदु बनाकर सूर और तुलसी ने 'सूरसागर 'एवं 'रामचरितमानस' की रचना की। दोनों भक्त कवि थे। सूर्य कृष्ण के भक्त थे और तुलसी राम के भक्त थे। तुलसी की सेवक भाव की थी एवं सूर्य ने सत्य भाव से कृष्ण की भक्ति की। पूर्व वल्लभाचार्य के पुष्टिमार्ग के अनुयाई थे और उन्होंने पुष्टि मारगी भक्ति के रूप में वर्णन किया था। तुलसीदास जी रामानुजाचार्य के शिष्य थे।तुलसी की भक्ति का आदर्श चातक प्रेम है जो अपने स्वामी के प्रति निस्वार्थ भाव रखता है और उसी की रट लगाए रखता है तुलसी की भक्ति में चातक की सी अनन्यता आता है । तुलसी को केवल अपने राम पर भरोसा है राम ही उनके बल हैं। "एक भरोसो एक बल, एक आस विश्वास।" एक शाखा की भांति अपने आराध्य कृष्ण से लड़ाई कर लेते हैं उन्हें उलाहना भी देते हैं- "आज मैं एक- एक कर टरि हौं "। अपने आप को तुलसी सदाराम का दास ही मानते हैं। उनसे अपनी बात सीधे-सीधे कहना भी धृष्टता मानते हैं । इसलिए सीता माता के माध्यम से राम को याद दिलाते हैं मैं राम को बहुत बड़ा और स्वयं को अति तुच्छ मानते हैं। भक्ति के एकाश्रयी दोनों कवि हैं। सूर की गोपियां भी कृष्ण को अपना सर्वस्व मानती हैं। गोपियों को उद्धव निर्गुण निराकार ब्रह्म के रूप में ध्यान करने का उपदेश देते हैं परंतु गोपियों की अनन्य भक्ति के सामने उद्धव के प्रवचन गोपियों के सर केऊपर से निकल जाते हैं। परम ज्ञानी उद्धव से गोपिया पूछती है कि आप ही बताइए जब हमारे पास एक ही मन है और उसमें भी कृष्ण तीर्थ से होकर खड़े हैं उसमें स्थान और बाकी नहीं है तो हम हमारे मन में निर्गुण का ध्यान करने के लिए स्थान बिल्कुल नहीं है तो हम निर्गुण का ध्यान कैसे करें। "उधौ मन न भए दस बीस। एक हूतौ सो गयो श्याम संग को आराधै इस।।" कृष्ण की भक्ति के बारे में स्वयं सूर कहते हैं कि मेरा मन अन्यत्र कहीं पर भी सुख नहीं पा सकता।कृष्ण की भक्ति के अलावा मुझे अन्यत्र कहीं भी शांति सुख की प्राप्ति नहीं हो सकती। "मेरो मन आनंत कहां सुख पावै । जैसे उड़ि जहाज को पंछी पुनि जहाज पै आवै।।" राम सीता के अलावा तुलसी को इस सृष्टि में कुछ भी दिखाई नहीं देता है। वे अपने आराध्य राम और सीता की ही सर्वत्र झलक पाते हैं- "सियाराम मय सब जग जानी। करहूं प्रणाम जोरि जुग पानी।।" अर्थात उनको यह सर्वस्व संसार सियाराम मय दिखाई देता है इसलिए वह सर्वोच्च संसार को सियाराम समझ कर विनम्रता पूर्वक प्रणाम करते हैं । अपने आराध्य को सूर और तुलसी अपना सर्वस्व मानते हैं। कृष्ण की तुलना में अन्य देवी देवताओं को शुरू छोटा मानते हैं। "सूरदास प्रभु कामधेनु ताजि छेरी कौन दुहावै ।" तुलसीदास जी भी लिखते हैं कि - "राम सों बड़ौ है कौन मौसौ कौन छोटौ।" ज्ञान मार्ग की तुलना में भक्ति मार्ग को दोनों कवि सरल एवं श्रेष्ठ मानते हैं भक्ति को चिंतामणि और ज्ञान को तलवार की धार कहते हैं तुलसीदास जी- "ज्ञान पंथकृपाण की धारा। परस खगेस लगही नहीं बारा।" और " राम भक्ति चिंतामनि सुंदर।"। "सूरदास " कहते है अवगति गति कछु कहत न आवै "सूर सगुन लीला पद गावै।" 'सूरसागर' के 'भ्रमरगीत' प्रसंग में सूरदास जी ने निर्गुण अर्थात निराकार ईश्वर की भक्ति से श्रेष्ठ सगुण अर्थात साकार ईश्वर की भक्ति को गोपीकाओं के माध्यम से श्रेष्ठ सिद्ध किया है। और प्रेम भाई भक्ति को ईश्वर प्राप्ति का सरलतम साधन बताया गया है। तुलसीदास जी भी प्रेम माई भक्ति की महत्ता को उत्तम बताते हैं यहां तक कि तुलसीदास जी ने यह कह डाला है की राम से प्रेम ना करने वाले को त्याग देना चाहिए। "जाके प्रिय न राम वैदेही। तजिए ताहि कोटी वेरी सम, जद्यपि परम सनेही। तुलसीदास जी राम के चरणों में प्रेम रखने को कहते हैं। - तुलसी सौं सब भांति परम हित परम पूज्य प्रान ते प्यारौ। जाते होई सनेहू राम पद एक तो मैं तो एतौ मतौ हमारौ । सूर और तुलसी दोनों की भर्ती अतुलनीय है। दोनों सभी ज्ञानी होते हुए भी भक्ति को प्रमुखता देते हैं। भक्ति की श्रेष्ठता बताते हुए तुलसीदास जी ने दार्शनिक विवेचना की है। विषय वस्तु ना होकर एक विश्वास की विषय वस्तु है इस कारण से भक्ति भाव की भावना से किसी को छोटा या बड़ा बताना कठिन है। और विश्वास के बिना भक्ति संभव नहीं है यथा- "बिनु विश्वास भगति नहीं होई।" अपने आराध्य देव के प्रति दोनों कवियों को अटूट विश्वास है। काव्य क्षेत्र में सूर और तुलसी सूर और तुलसी उच्च कोटि के भक्त होने के साथ-साथ कवि भी हैं। 'रामचरितमानस' महाकाव्य तुलसीदास द्वारा लिखा गया है जोकि वेद के समान हिंदू जनता के लिए पूज्य है। दूसरी हो सूरदास ने विशाल ग्रंथ 'सूरसागर' लिखा है। । 'रामचरितमानस' महाकाव्य है और 'सूरसागर' मुक्तक ग्रंथ है। मुक्तक होते हुए भी सूरसागर एक बहुत बड़ा ग्रंथ है। तुलसी ने अपने काव्य में राम को आधार बनाकर संपूर्ण जीवन का अपने युग की विविध विशेषताओं का समाज के सभी रीति-रिवाजों का सभी परिस्थितियों स्थितियों का आकलन किया है तो वहीं दूसरी तरफ सूर्य बाल वृत्ति और यौवन वृत्ति का ही मुख्य रूप से चित्रण किया है। यद्यपि सूर के काव्य का क्षेत्र सीमित है तथापि उसमें जितनी गहराई है क्षमता है उतनी विश्व के किसी कवि के काव्य में इन दो वृत्तियों के बारे में पढ़ने देखने को नहीं मिलेगी। आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी ने कहा है कि " सूर अपनी बंद आंखों से बाल स्वभाव का कोना कोना झांक आए हैं। उनकी बाल कृष्णा हो के वर्णन के आगे अन्य कवियों द्वारा किया गया बाल स्वभाव का वर्णन जूठन सा लगता है बच्चों के स्वभाव का इतना सूक्ष्मता से विशद वर्णन किया है कि उन स्वभाव विशेषताओं के नाम गिनाना भी मुश्किल है। तुलसी ने यद्यपि बालकों के स्वभाव के अनेक रूपों का बाल छवियों का विस्तार से वर्णन किया है, इस क्षेत्र में वसूल की बराबरी तक नहीं पहुंच पाए बच्चों के प्रभाव का इतना इतना वर्णन संसार का कोई भी नहीं कर पाया क्षेत्र में अकेले कभी हैं उनका कोई भी सानी नहीं है।सूरत से इस क्षेत्र में आगे हैं कि उन्होंने पूरा जीवन चित्र प्रस्तुत किया है उन्होंने जीवन का सांगोपांग उत्कृष्ट वर्णन किया है कृष्ण के सौंदर्य का ही मुख्य रूप से वर्णन किया है। गोवर्धन धारण, कालिया नाग दमन, कंस वध आदि प्रसंगों में ही उनकी शक्ति के दर्शन होते हैं, इनपुट टूल्स राम भक्ति सील और सौंदर्य के अवतार हैं। इनमें रावण कुंभकर्ण मरीज आदि राक्षसों को मार कर सामान्य जनता को अभयदान देने की शक्ति है। पिता की आज्ञा पर राज्य त्याग कर वन के कष्ट भोगने के लिए चल पड़ते हैं और अपने शील का परिचय देते हैं।ऋषि मुनियों माता पिता गुरु की आज्ञा का पालन करने वाले शीलवान व्यक्ति हैं। भीम में कृष्ण के अधिकतर लोग रंजक रूप का ही चित्रण किया है।उनकी लीलाओं से नंद यशोदा बाल बाल गोपी कहां है प्रसन्न होती हैं उधर तुलसी ने राम के लोक रक्षक के रूप का चित्रण किया है । अपने काव्य में तुलसीदास जी ने सभी रसों का निरूपण किया है। जीवन का उज्जवल चित्रण करने के कारण उन्हें ऐसा करने का अवसर मिला है । वत्सल्य रस का वर्णन उन्होंने राम के बाल रूप में किया है। राम एवं सीता के संयोग एवं वियोग दोनों प्रकार के श्रृंगार रस का चित्रण तुलसीदास जी ने भली-भांति किया है। सीता हरण के तुरंत बाद राम के योगी रूप के वर्णन में वियोग श्रृंगार रस का वर्णन है उनको एक सांसारिक सामान्य व्यक्ति की भांति रोते हुए एवं दुखी होते हुए पशु पक्षियों से सीता का पता पूछते हुए दर्शाया गया है। व्यक्ति का हृदय वियोग में उधार हो जाता है। सीता के वियोग में राम वन में पक्षियों पशु और ब्राह्मणों से सीता के बारे में पूछते हैं कि - 'हे खग हे मृग मधुकर श्रेनी, तुम देखी सीता मृगनैनी?' कवि ने अपनी फ्रेंड देवता का परिचय देते हुए राम के वन गमन के अवसर पर अयोध्या वासियों को दुखी होते हुए चित्रण किया है। अयोध्या का दशरथ निधन पर अयोध्या वासियों का विलाप वन मार्ग में राम सीता लक्ष्मण को देखकर ग्राम वासियों का दुखी होना लक्ष्मण के शक्ति लगने पर राम का विलाप करना अन्य धार्मिक स्थल है जहां तुलसी ने पूर्ण सहृदयता का परिचय दिया है- मेरौ सब पुरुषारथ जाको। विपति बटावनि बंधु बाहु बिन करौं भरोसौं काकू।। और इसी प्रकार एक अन्य स्थान पर वो कहते हैं कि जो जानतेहू बन बंधु विछोहू । पिता वचन मानतेहु ओहू। नारद मोह के अवसर पर हास्य रस लंका दहन के अवसर पर भयानक रस लक्ष्मण परशुराम संवाद के अवसर पर रौद्र रस राम रावण युद्ध के अवसर पर वीर रस लक्ष्मण के शक्ति लगने पर करुण रस का वर्णन किया गया है इस प्रकार तुलसी ने अपने काव्य में सभी रसों का समावेश किया है मर्यादा का ध्यान रखने वाले तुलसी सीता के सौंदर्य एवं श्रृंगार रस के वर्णन में संयंत हैं। यद्यपि सूरदास जी ने अपने काव्य में लगभग सभी रसों का वर्णन किया है तथापि उनके काव्य में मुख्यतः आया वात्सल्य और श्रृंगार रस का वर्णन हुआ है। जैसा वर्णन इन्होंने दोनों रूपों का किया है वैसा किसी ने नहीं किया। बालक कृष्ण की बाल छवियों का उनके मनोभाव का बहुत ही विशद रूप में मनोवैज्ञानिक ढंग से वर्णन किया गया है। किसी वस्तु को प्राप्त करने का उतावलापन बच्चों में होता है उनमें धैर्य का अभाव पाया जाता है। कृष्ण कच्चा दूध पीते हैं और तभी अपनी चोटी की लंबाई देखने लगते हैं कि छोटी बढी या नहीं - मैया कबहु बढ़ेगी चोटी। किती बार मोहि दूध पियत भई यह अजहूँ है छोटी। कृष्ण और उनके सखा बड़े ही नटखट और शैतान रहते हैं। कृष्णा पड़ोस की गोपियों मक्खन गोरख आदि चुरा कर खा जाते हैं और पकड़े जाने पर जब गोपियों द्वारा यशोदा से शिकायत की जाती है तो झूठ बोलकर बहाने बनाकर बचने की कोशिश करते हैं यथा- मैया मोरी मैं नहीं माखन खायो। भोर भरे गैयन के पीछे मधुबन मोहि पठायौ। कृष्ण के मथुरा चले जाने पर सारा ब्रज बेहाल हो जाता है।यशोदा मथुरा देव की कृपा कृष्ण की देखभाल करने के बारे में संदेश भिजवाती है। यशोदा को लगता है कि उनके बराबर कृष्ण की देखभाल कोई और नहीं कर सकता। संदेसो देवकी सो कहियो। हौं तो धाय तिहारे सुत को दया करत रहियो।। यशोदा के कथन में पुत्र के बारे में चिंता का भाव है। वात्सल्य है विनम्रता शालीनता है। कृष्ण की लीलाओं का उनके शारीरिक सौंदर्य का माखन चोरी चीरहरण आदि क्रियाओं का उनकी नटखट बातों का पुत्र के बारे में माता-पिता यशोदा और नंद की भावनाओं का गोपियों की शिकायत सुनकर भी यशोदा द्वारा उत्तर का पक्ष लेने की प्रवृत्ति आदि सभी का सूर ने भली-भांति वर्णन किया है । |
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