हिंदी कहानी बादाम का छिलका
एक बार एक साहूकार था। वह अत्यधिक धनी होने के साथ-साथ बहुत कंजूस भी था । वह कभी भी किसी की ना तो सहायता करता था और ना ही दान पुण्य करता था। एक दिन साहूकार और उसकी पत्नी बादाम छीलकर खा रहे थे। इतने में एक गरीब भिखारी आकर भीख मांगने लगा। भिखारी द्वारा अत्यधिक विनती करने पर साहूकार ने बादाम का एक छिलका उसे दान में दे दिया। बिहारी छिलका लेकर चला गया।
कुछ दिनों पश्चात् साहूकार कहीं रात के अंधेरे में जा रहा था। रास्ते में एक गड्ढे में वहां जाकर गिर गया। गड्ढे में घनघोर अंधेरा था उसे कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था। थोड़ी देर बाद उसको एक सर्प की फुसफसाहट सुनाई दी ।
साहूकार डर के मारे "मरामरा" कहने लगा । लगातार मरा मरा कहते हुए रामराम का नाम अनजाने में ही उसके मुंह से निकलने लगा ।
अब सर्प ने साहूकार को देखकर उसकी और काटने दौड़ा। किंतु जैसे सर्प साहूकार को ही डसने के लिए अपना फन उठाता वैसे यह बादाम का छिलका उसके फन के आगे आ आ जाता एवं साहूकार के जीवन की रक्षा हुई। इस प्रकार अनजाने में ही लिए गए राम के नाम एवं एक छोटे से छोटा किया गया परोपकार भी व्यक्ति के जीवन में अत्यधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
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