दीक्षा कहानी | Hindi kahani deeksha

 एक बार एक गुरुकुल में गुरुदेव ने अपने शिष्यों की शिक्षा पूरी की एवं उनकी दीक्षा का समय आ गया। गुरुदेव ने सभी शिष्यों की दीक्षा भी ले ली किंतु उनके दो प्रिय शिष्य जो कि सर्वश्रेष्ठ थे उनकी दीक्षा लेनी बाकी रह गई थी।  गुरुदेव ने उनको एक एक लोटा देकर कहा कि इसे अच्छी तरह से मांजगर साफ कर और साफ स्वच्छ जल भर कर लाओ । दोनों शिष्यों ने अपने गुरु की आज्ञा का पालन किया। एवं लोटे में जल भरने के लिए नदी के किनारे चल पड़े । वहां पहुंचकर दोनों ने लोटा मांजना शुरू किया । गुरुदेव का प्रथम शिष्य जो कि एक राजकुमार था उसने लौटे को अंदर सेक्स केवल एक बार हल्का सा साफ किया और बाहर से रगड़ रगड़ कर मांजने लगा उसको इतना रगड़ा बाहर से कि वह चमकने लगा । किंतु द्वितीय शिष्य जो था वह एक गरीब किसान पुत्र था उसने लोटे को अंदर की तरफ से अधिक रगड़ रगड़ कर महाजना शुरू किया एवं उसकी सफाई अच्छी तरह से कर दी और बाहर से भी की । किसान पुत्र को ऐसा करते देख राजकुमार उस पर हंसने लगा और उसने कहा कि "बाहर से तो सभी देखते हैं अंदर से लौटा कौन देखता है इसलिए तुम मूर्ख हो जो तुम अंदर से इतना सफाई कर रहे हो ।"

किसान पुत्र राजकुमार की बात सुन कर मुस्कुरा दिया एवं अपना लौटा तो होकर भरने लगा । राजकुमार एवं किसान पुत्र दोनों ने लोटा साफ कर उसमें स्वच्छ जल भर गुरुदेव के पास पहुंचे । 

सर्वप्रथम गुरुदेव ने राजकुमार का लोटा अपने हाथ में लिया और उसका परीक्षण किया गुरुदेव ने देखा कि लोटा बाहर से तो चमक रहा था लेकिन अंदर से गंदा था । फिर गुरुदेव ने किसान पुत्र का लोटा लेकर उसका भी परीक्षण किया तो किसान पुत्र का लोटा अंदर से भी अत्यधिक चमक रहा था और बाहर से भी। दोनों के लोटे के परीक्षण के बाद गुरुदेव ने राजकुमार से कहा कि अभी तुम्हारी शिक्षा दीक्षा अधूरी है तुम्हें गुरुकुल में दोबारा शिक्षा प्राप्त करनी होगी । गुरुदेव ने फिर किसान पुत्र की तरफ देखते हुए कहा कि तुम अपनी शिक्षा दीक्षा पूर्ण रूप से प्राप्त कर चुके हो । 

जितने मुंह उतनी बातें कहानी

  यह सुनकर राजकुमार ने गुरुदेव से क्षमा मांगते हुए प्रश्न किया कि गुरुदेव मुझ में ऐसी क्या कमी रह गई थी ? 

इस पर गुरुदेव ने अपने राजकुमार शिष्य एवं किसान पुत्र दोनों को स्पष्ट करते हुए बताया कि - " मैंने तुम दोनों की परीक्षा लेने के लिए एक एक लोटा साफ करके जल भरकर लाने लिए कहा था और तुम दोनों ने मेरी आज्ञा का पालन भी किया किंतु राजकुमार के कर्तव्य में कुछ कमी रह गई वह यह थी कि राजकुमार ने लूटे को बाहर से तो बहुत रगड़ रगड़ कर साफ़ किया किंतु उसके अंदर की सफाई अच्छी तरह से नहीं की ।

और किसान पुत्र तुमने उस लौटे को अंदर से भलीभांति रगड़ कर साफ़ करके और उसमें जल भरा । 

यह लोटा हमारे जीवन का प्रतीक है एवं उसका बाहरी हिस्सा हमारे शरीर का प्रतीक है और अंदर का हिस्सा हमारे मन का प्रतीक है जिसको कि हमें साफ एवं स्वच्छ रखना चाहिए शरीर की जितनी सफाई बाहरी रूप से होनी चाहिए उससे कहीं अधिक हमें अपने अंतर्मन में व्याप्त बुराइयों को दूर करना चाहिए यानी कि मन की सफाई भी करनी चाहिए । 

गुरुदेव के स्पष्ट करने पर दोनों शिष्यों को यह बात भली-भांति समझ में आ गई । 

moral - व्यक्ति को बाहरी आवरण एवं लोक दिखावा करने के बजाए अपने अंतर्मन की साफ-सफाई एवं शुद्धता पर अधिक ध्यान देना चाहिए ।

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