किसान का दर्द कविता

kisan ka dard kavita


 दिन रात करता हूं मेहनत,

      तुम खाकर बर्गर बनाते हो सेहत !


मैं तपती धूप में हल जोतता हूं,

     जानवरों को फसल खाने से रोकता हूं।


तुम मंदिर मस्जिद रोज जाते हो,

     क्या कभी किसान की हालत देख ले एक बार भी आते हो।


खेतों के हो गए टुकड़े,

    पसीने में लथपथ रहते हैं हमारे मुखड़े ।


कारखानों की गंदगी मिलाई पानी में,

   कर्ज की वजह से लगाई फांसी जवानी में।


बच्चों के लिए पढ़ाई नहीं है,

     बूढ़ों के लिए दवाई नहीं है।


तुम्हें चाहिए एसी और हिटर,

    किसान के बेटे के पास नहीं है अच्छा टीचर।


भूखे रहकर करता हूं पैदा अनाज,

बाढ़  में कोई नहीं है सुनता मेरी आवाज।


क्या हमने तुम्हें वोट दिया नहीं,

 फिर क्यों तुमने हमारा कर्ज माफ किया नहीं ?

इस दुनिया में कोई भगवान है,

       तो वह गरीब किसान है ।

Written by Chhavi Mishra.