सुप्रभात कविता suprabhat kavita

सुप्रभात  कविता suprabhat kavita 

सुप्रभात  कविता suprabhat kavita

  

सुप्रभात ! कविता 

सूर्य लालिमा लेकर

रश्मि रथ पर चढ़कर ,                     

 तम की प्राचीर को चीर

धरा अक्ष पटल पर , 

किरण कलश रहा बिखेर

रवि - धरन हों रहीं स्पर्श

पिघल रहा हिमालय का शीर्ष

सुप्रभात !   

बहता निर्झर कल-कल 

स्वच्छ उज्जवल धवल 

 पूर्णं तरण-ताल-सागर

जल कुमुदिनी पर 

गुंजन करते भ्रमर 

जैसे गा रहे मंगल गान

अहो ! कर अभिनंदन

सुप्रभात !

 कमल दल पत्र हैं तर

ओस के मोती रहे बिखर

 कलरव करते खग - चर 

आकाश में रहे ये विचर

चले द्विज जीवन सजाने

तिनका - तिनका लाने

रहते रत निलय बनाने

अपना गंतव्य खोजने 

चले पथिक अंजाने

सुप्रभात !

Written by -  Neelam

 शब्दार्थ : - लालिमा - प्रफुल्लता ,रश्मि - : किरण ,तम :- अंधेरा , प्राचीर- दीवार, 

धरा - पृथ्वी ।अक्ष - धुरी, आधार ।पटल :- आवरण । धरन - कडी़, किरण।

स्पर्श - छूना । शीर्ष- सिरा ,ऊपर ।निर्झर - झरना । पूर्णं - लबालब भरा हुआ ।

 तरण-ताल - तालाब । भ्रमर - भंवरा ।

पत्र - पत्ता । तर- गीला । कलरव - चहचहाना । खग - पक्षी । चर - प्रभावित करने वाली वस्तुएं । विचर - घूमना।द्विज - पक्षी । रत - मगन ।निलय - घोंसला ।गंतव्य - मंजिल ।पथिक -यात्री ।