प्रदूषण कविता


प्रदूषण कविता

विश्व में अनेकों ऐसी समस्याएं हैं या अपने भारत देश में भी हैं जिनका समाधान या तो निकल नहीं पाता है या उन्हें जानबूझकर अपने स्वार्थ पूर्ति के लिए अनदेखा कर दिया जाता है इन्हीं समस्याओं को देखकर मेरे मन में जो शब्द मंथन हुए हैं उन्होंने कविता का रूप ले लिया है।

संपूर्ण विश्व मे  समस्या है भीषण
 वो है चारों तरफ फैलता प्रदूषण
जगह-जगह लगा है कचरे का ढेर
घूमते वहां आवारा पशु लगाते टेर 
कूड़ा - करकट से फैलती महामारी
साफ - सफाई किसकी है जिम्मेदारी ?
कल - कारखानों से निकलने वाले
जहरीले रसायन युक्त पानी के नाले
ये जाकर मिलते नदिया - सागर में
इनके जल को दूषित कर देते पलभर में
नदिया - नहर हैं इस देश के भूषण
न जाने कब मिटेगा जल प्रदूषण ?
सड़कों पर वाहनों का लगा है जाम
विषाक्त धुआं निकलना है इनका काम
कारखानों से निकलते हैं धूम्र के बादल
 कायदे- कानून के नहीं हैं कायल
क्या तुमने सुना है वृक्षों का रुदन ?
जब निरंतर कटते हैं वन - उपवन
धीरे-धीरे खो रहा अपनी सांसें जन 
 इसका कारण है बढ़ता वायु प्रदूषण
मंदिर, मस्जिद हो या चुनावी तंत्र 
इन सबमें बजते हैं ध्वनि - विस्तारक यंत्र
विवाह-उत्सव हो या कोई पर्व
डीजे बजाने पर प्रतीत होता है गर्व
इसकी आवाज से बच्चे-बूढ़े करते क्रंदन
बढ़ता ही जा रहा है ध्वनि प्रदूषण ।
Poem writer 🖋️- Neelam .