दूरदर्शन कविता
दूरदर्शन kvita
न जाने कब से सोच रहा था मेरा मन
पहले सबके लिए कौतूहल था दूरदर्शन
प्रारंभ में शैक्षिक कार्यक्रमों से शुरु होकर
मनोरंजन का साधन बना आगे चलकर
वहीं थम जाता था समय का पल क्षण
जब आता था महाभारत और रामायण
बुझ जाती थी इनसे भक्ति - रस तृष्णा
देखकर जय हनुमान तथा श्री कृष्णा
गजब था जादू और तिलिस्म का जाल जब देखते चंद्रकांताऔर विक्रम बेताल
सुरभि लाती कला और संस्कृति का ज्ञान
भारत एक खोज में था इतिहास का गान
जाग उठता था हर नारी का स्वाभिमान
जब देखते थे सब आरोहण और उड़ान
बच्चे जवान हो या कोई उम्र हो साठा
देखते थे सब मिलकर द ग्रेट मराठा
प्यारा मोगली था सबका मनपसंद
सब बच्चे देखकर हो जात थेे दंग
इस देश में था जब पुरुषों का वर्चस्व
करती थी वाचन समाचार सर्वस्व ।
समाज की रूढ़ियों को छोड़ न घूंघट पर्दा
अपने देश में होता सम्मान उनका सर्वदा सलमा सुल्तान नीलम शर्मा मंजरी जोशी
अविनाश कौर सरला माहेश्वरी थीं विदुषी
सब सुनते ध्यान लगाकर निष्पक्ष वचन
जब करता समाचार प्रसारण दूरदर्शन
नीम का पेड़ ,शांति, घुटन ,स्वाभिमान,
और वेद व्यास के पोते करते मनोरंजन
होते थे हर्षित मोह लेता था सबका मन
हरिप्रसाद चौरसिया का बांसुरी वादन
जाकिर हुसैन का तबला जब बजता
अपार जन समूह का दरबार था सजता ।
किसानों का होता था मुख्य आकर्षण
खेती-बाड़ी का ज्ञान देता कृषि दर्शन
ऐसा था हमारा प्यारा दूरदर्शन ।