आज का बचपन कविता

           कविता
      आज का बचपन 
नहीं रहे अब वो घर आंगन 
जिनमें बसता था अपनापन
लाड़ -प्यार बरसाते अपने जन
उनको खोज रहा आज का बचपन ।
 रहते थे आबाद गली - मोहल्ले 
सुबह- शाम होते थे हल्ले - गुल्ले
 कंचे , गुल्ली-डंडा,हॉकी - कबड्डी
 सतोलिया , लुका - छिपी गुड्डे - गुड्डी
 और भी होते थे खेल ऐसे ही पचपन
इनसे वंचित हो गया है आज का बचपन
कहां गए ? हंसते चेहरे सूरत भोली 
बनाते थे कागज की नाव और रंगोली
पड़ जाते थे झूले जब आता सावन 
झूला - झूलते,  गाते मनभावन
गूंजती थी किलकारियां वन -उपवन
ये सब भूल रहा है आज का बचपन 
 दाल बाटी चूरमा इडली सांभर डोसा 
रसगुल्ला मिठाई और चटनी समोसा  
खाये जाते और भी कई भोग थे छप्पन
क्यों मुख मोड़ रहा है आज का बचपन ।
Poem writer- Neelam