deepak kavita दीपक कविता

कविता
 

 मैं एक नन्हा - सा दीपक हूं ।

भव्य - दिवाकर का यमक हू ,


कादम्बरी राहों की चमक हूं,

रजनी के साम्राज्य में व्यापक हूं ।


तूफानों ने की कोशिशें मुझे बुझाने की,

हुई बहुत चेष्टा मेरा अस्तित्व मिटाने की ।


फिर भी हार नहीं मानूंगा मैं नीरव,

डटा रहूंगा जब तक है मुझमें विभव ।


नहीं रुकूंगा क्षणिक ,असंभव है पराभव,

आंधियां करें चाहे जितना तांडव ।


कर्त्तव्य विमुख नहीं होऊंगा तनिक,

मेरी प्रभा पर दृढ़ आस्तिक हैं पथिक।


इस तिमिर सागर में नहीं हूं एकाकी,

मेरे साथ जल रहे हैं तेल और बाती  ।                                  

प्रांगण जगमग करने को हूं उद्यत,

निशा का भय नहीं मुझको मैं हूं उद्योत ।।


             Written by 🖋 Neelam


शब्दार्थ :-भव्य -बड़ा ,दिवाकर -सूर्य,यमक-निचोड़ ,कादम्बरी-रात,  रजनी-रात , व्यापक- विस्तृत , अस्तित्व- जीवन , नीरव - शांत , विभव - क्षमता , पराभव - हारना ,तांडव - ज्यादती ।विमुख - हटना । प्रभा -चमक । दृढ़-स्थायी । आस्तिक- विश्वास करना ।

पथिक - यात्री । तिमिर सागर - अंधेरे का  समुद्र । एकाकी - अकेले । प्रांगण - आंगन । उद्यत - तैयार । निशा - रात । 

उद्योत - दीपक ।