अरावली की पुकार कविता
| लगभग 70 करोड वर्ष पहले जन्मी विश्व की सबसे प्राचीन पर्वत मालाओं में से एक हैं यह पर्वत श्रेणियां आग्नेय चट्टानों के "आड़े वलय" से बनी हुई है "अड़ावल" कहा जाता है यह राजस्थानी भाषा का शब्द आदि काल में आदिवासियों के मुख से स सुना जाता था आर्यों के रहने के कारण अंग्रेजों इसे "आर्यन वैली "कहा करते थे जिस कारण से आज इन पर्वत श्रेणियों को "अरावली पर्वत" के नाम से जाना जाता है। भारत के पश्चिमी भाग में यह स्थित है अरावली पर्वत श्रृंखला है लगभग दक्षिण से उत्तर की ओर 692 किलोमीटर की लंबाई में फैली हुई है गुजरात से दिल्ली तक का विस्तार है राजस्थान विस्तार के मध्य में है सिरोही जिले के आबू पर्वत में स्थित गुरु शिखर की ऊंचाई लगभग 17 से 22 मीटर है यह इसकी सबसे ऊंची चोटी है ।यह पर्वत श्रेणियां सदैव हरी भरी रहती है दक्षिणी तथा मध्य क्षेत्र में सघन वन है। एक समय था जब इसके सघन वनों में अनेक पशु पक्षी रहते थे किंतु अब वह सारा सौंदर्य दिन प्रतिदिन गायब हो रहा है इसका कारण है वनों की अवैध कटाई तथा अवैध खनन । |
जिसके कारण यहां का सौंदर्य नष्ट हो रहा है मनुष्य ने अपने स्वार्थ के लिए अनेकों कारखाने खड़े कर रखे हैं अवैध खनन हो रहा है वनों की कटाई हो रही है प्रदूषण फैल रहा है और यहां का प्राकृतिक संतुलन भी बिगड़ रहा है कहीं ऐसा ना हो कि यह एक रेगिस्तान में बदल जाए इन सब को देखकर मेरे मन में उथल-पुथल हुए शब्द मंथन के बाद एक कविता ने जन्म लिया जिसका नाम है "अरावली की पुकार" आप भी पढ़ें धन्यवाद।
इनमेंं भी है जान
प्रकृति दुनिया की है पहचान
एक दिन अरावली पर्वत बोला
अपने दिल का राज खोला
कटती यहाँ झाड़ियाँ है
सूखती है यहाँ बावड़ियॉ
पत्थर - पत्थर टूट कर कर गिरते हैं
ये इंसान मुझ पर बहुत जुल्म करते हैं
सुनसान क्षेत्रों में
बमों की वर्षा करते हैं
सामने आने से डरते हैं
लेकिन उन्हें क्या मालूम
इनमें भी है जान
प्रकृति दुनिया की पहचान है
फूल पत्ते लगते हैं सुनहरे
रक्षा करता हूँ लोगों की
अभी है अंश मेरे हरे भरे
सुनसान नहीं है मेरे इलाके
मोर पक्षी जहां है जहां पे
पत्थर हे छोटे-मोटे
आएंगे इंसान के दिन खोटे
मेरे अंदर के जानवरों का परिवार है
रक्षा के लिए शेरों की दहाड़ है
इस कलयुग में प्रकृति पर इंसानों की मार है
लेकिन इन्हें क्या मालूम
इनमें भी है जान
प्रकृति दुनिया की पहचान है
अरे मैं बेजुबान चीखता नहीं
इसके पास बुद्धि होने के बावजूद ये कॉविड से सीखता नहीं
इनकी बिल्डिंग से बड़ी है हमारी चोटियां
डेवलपमेंट के बाद भी खाते क्यों इस मिट्टी की रोटियां
जब धरती हिलेगी
ज्वालामुखी फटेगा
मेरा भाई हिमालय भी पिघलेगा
आखिर तुम कब तक अरावली पर खौफ जमाएगा
लेकिन उन्हें क्या मालूम
इनमें भी है जान
प्रकृति दुनिया की है पहचान
अभी तो यह सीएम अपना पैगाम पहुंचाएगा
वरना आगे इस दुनिया को ब्लैक होल निगल जाएगा