नदी और जंगल के बिना हरियाली कैसे रेगिस्तान बन जाती है

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प्रस्तावना
भारत की पहचान उसकी नदियों और हरे-भरे मैदानी क्षेत्रों से रही है। यहाँ की मिट्टी ने न सिर्फ़ अन्न उपजाया बल्कि पूरी सभ्यता को जीवन दिया। लेकिन इतिहास गवाह है कि जब नदियाँ सूख गईं और जंगलों का नाश हुआ, तो हरियाली धीरे-धीरे रेगिस्तान में बदल गई। राजस्थान इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। आज यही खतरा गंगा के मैदानी क्षेत्र उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल पर मंडरा रहा है।
राजस्थान की पुरानी स्थिति:
हरित भूमि और नदियाँ
हज़ारों साल पहले राजस्थान का इलाका हरा-भरा था।
सरस्वती, द्रष्टवती, कागारणी जैसी नदियाँ यहाँ बहती थीं।
खेती-बाड़ी और पशुपालन खूब होता था।
पुरातात्विक साक्ष्य बताते हैं कि सिंधु-सरस्वती सभ्यता के नगर (कालीबंगा, घग्घर क्षेत्र) इसी इलाके में बसे थे।
जंगल और उपजाऊ मिट्टी
घने जंगल भूजल को recharge करते थे।
मिट्टी में नमी और उर्वरता बनी रहती थी।
वर्षा संतुलित थी, और स्थानीय जलस्रोत सालभर भरे रहते थे।
अंधाधुंध पेड़ों की कटाई से वर्षा कम हुई और भूजल recharge ठप हो गया। परिणामस्वरूप राजस्थान का बड़ा भाग थार के रेगिस्तान में बदल गया।


राजस्थान की वर्तमान स्थिति:
नदियों का सूखना
जलवायु परिवर्तन, भूकंपीय हलचलों और हिमालय से आने वाली नदियों का मार्ग बदल जाने से सरस्वती जैसी नदियाँ सूख गईं।
जब नदियाँ ही नहीं रहीं तो धीरे-धीरे खेत बंजर होने लगे।
जंगलों का विनाश
अंधाधुंध पेड़ों की कटाई से वर्षा कम हुई और भूजल recharge ठप हो गया।
परिणामस्वरूप राजस्थान का बड़ा भाग थार के रेगिस्तान में बदल गया।

आज की स्थिति
यहाँ साल के ज़्यादातर समय सूखा रहता है।
लोग पानी के लिए नलकूप और टैंकरों पर निर्भर हैं।
खेती सीमित और कठिन हो चुकी है।
गंगा का मैदान: वर्तमान और संभावित भविष्य
उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल का गंगा मैदानी क्षेत्र आज भारत का सबसे उपजाऊ इलाका है।
गंगा और उसकी सहायक नदियाँ (सोन, घाघरा, गंडक, कोसी, दामोदर) भूमि को सींचती हैं।
धान, गेहूँ, गन्ना और दलहनों की भरपूर खेती होती है।
यह क्षेत्र करोड़ों लोगों की अन्न-थाली है।
लेकिन खतरों की अनदेखी नहीं की जा सकती:
पेड़ों की कटाई – जंगल सिकुड़ते जा रहे हैं।
भूजल का अति-दोहन – उत्तर बिहार और पश्चिम बंगाल के कई इलाकों में भूजल का स्तर गिरता जा रहा है।
नदियों का प्रदूषण और गाद जमाव – गंगा और सहायक नदियाँ धीरे-धीरे प्रदूषण और गाद से भर रही हैं।
जलवायु संकट – बाढ़ और सूखा चक्र दोनों तेज़ी से बढ़ रहे हैं।
यदि यही स्थिति रही तो आने वाले दशकों में गंगा का मैदान भी राजस्थान जैसी कठिनाई का सामना कर सकता है।
समाधान और रास्ता
नदी-पुनर्जीवन: स्थानीय नदियों और तालाबों को पुनर्जीवित करना, जैसे अलवर (राजस्थान) में अरवरी नदी को पुनर्जीवित किया गया।
वृक्षारोपण: नदी किनारों और गाँवों में बड़े पैमाने पर वृक्ष लगाना। नीम, पीपल, बरगद, बाँस जैसी प्रजातियाँ सबसे उपयोगी हैं।
जल-संरक्षण: वर्षा जल संचयन, छोटे बाँध, तालाब और चेक-डैम बनाना।
जैविक खेती: रासायनिक खेती से मिट्टी की ताकत घट रही है; जैविक खेती अपनाना जरूरी है।
सामूहिक चेतना: गाँव, शहर और सरकार सबको मिलकर इस दिशा में कदम बढ़ाना होगा।

राजस्थान का उदाहरण हमें चेतावनी देता है कि अगर नदियाँ और जंगल खो दिए जाएँ तो उपजाऊ भूमि भी रेगिस्तान में बदल सकती है। गंगा का मैदान आज उपजाऊ है, लेकिन अगर हमने जल और वृक्षों की रक्षा नहीं की तो भविष्य अंधकारमय हो सकता है।
यही समय है जब हमें "जल ही जीवन है" और "पेड़ ही पृथ्वी की साँस हैं" को सिर्फ़ नारा नहीं, बल्कि जीवन का हिस्सा बनाना होगा।