पत्थरों से हरियाली तक – एक बहू की आँखों से बदला मेरा गांव

बीस साल पहले जब मैं इस गांव में बहू बनकर आई थी, तब ये धरती मुझे बेरंग और रूखी सी लगी थी।

सिर्फ मिट्टी ही नहीं, ज़िंदगी भी जैसे सूख चुकी थी।

गांव अरावली की गोद में बसा था, लेकिन मिट्टी पत्थरों से भरी थी। यहां बारिश साल भर में बस दो या तीन दिन होती थी। खेतों में फसलें सूख जाती थीं, और बारानी पानी जहां गिरता, वहां से बहकर गांव से बाहर निकल जाता।

बिजली और पानी दोनों बेशकीमती थे।

लाइट दिन में अक्सर चली जाती थी और कई बार तो आंधियों के कारण 15-15 दिन तक अंधेरे में रहना पड़ता था। उस साल ना ट्यूबवेल चले, ना नल आया।

यहां तक कि हैंडपंप भी जवाब दे गया उसमें से सिर्फ रेत निकलती थी।

आख़िरकार हमें एक पुराने कुएं से पानी खींचना पड़ा जिसकी रस्सी इतनी लंबी थी कि लगता था मानो एक किलोमीटर ज़मीन के नीचे से पानी खींच रहे हों।

पानी लाना मेरी जिम्मेदारी थी।

एक बहू थी, घूंघट में थी, और गांव के दूसरे छोर पर मंदिर से सिर पर मटका रखकर रोज़ पानी लाती थी पूरे 10 लोगों के लिए।

उसी समय NREGA (  NATIONAL RURAL EMPLOYMENT GUARANTEE SCHEME) योजना की शुरुआत हुई।

ग्राम पंचायत ने बेरोज़गारों को रोज़गार देने के लिए तालाब (जोहड़) की खुदाई का ठेका दिया।

ज़्यादातर महिलाएं इस काम में लगीं मैंने सुना कि ठेकेदार महिलाओं को पुरुषों से कम पैसा देता था, और उनके साथ गाली-गलौच करता था।

लेकिन मैंने तब केवल सुना क्योंकि मुझे तो सिर्फ पानी लाने की इजाज़त थी, गांव की सीमा से बाहर जाने की नहीं।

पर धीरे-धीरे, मिट्टी और हालात दोनों बदलने लगे।

जहां पानी बहकर जाता था, वहीं जोहड़ बनाया गया मिट्टी समेटी गई, और 2 फीट मोटी दीवार खड़ी कर दी गई।



अब बारिश होती तो सारा पानी उस जोहड़ में जमा हो जाता।

धीरे-धीरे पानी ज़मीन में समाने लगा।

किसानों ने बोरिंग करवाई, किसी ने सोलर पैनल लगाकर पानी खींचना शुरू किया।

फिर वो पानी आसपास के खेतों में भी बेचा जाने लगा।

फसलें लहलहाने लगीं, और कुछ समझदार किसानों ने अपने खेतों में पेड़ भी लगाए जिससे गांव का तापमान, नमी और बारिश तीनों में सुधार हुआ।

आज 20 साल बाद

वही गांव हरा-भरा है।

वही ज़मीन जो कभी पथरीली थी, अब नमीदार है।

अब बारिश ठीकठाक होती है, नल में पानी आता है, और खेतों में हरियाली है।

मेरे लिए यह केवल मिट्टी का बदलाव नहीं था ये मेरी सोच, सीमाओं और सपनों का भी बदलाव था।

मैंने उस गांव को जिया है जहां प्यासे खेतों के बीच एक बहू भी प्यासा था आज उसी गांव की हरियाली में मेरी आंखों की नमी भी घुल चुकी है।

"अगर इरादे सच्चे हों, तो पत्थर भी पानी रोक सकते हैं, और सूखी ज़मीन भी हरियाली ओढ़ सकती है।

ज़रूरत है साथ चलने की, मिट्टी से जुड़ने की, और प्रकृति की पुकार सुनने की।"

#Earthingo

धरती से जुड़ी कहानियों की आत्मा।


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