Rajasthan ke abhyaran | राजस्थान के वन्य जीव एवं अभ्यारण
"वन्य जीव सुरक्षा अधिनियम 1972" में भारत सरकार ने पारित किया। इस अधिनियम के तहत संरक्षण स्थलों को तीन भागों में विभाजित किया गया।
* 1 राष्ट्रीय उद्यान
* 2 अभ्यारण
* 3 आखेट निषेध क्षेत्र
भारत सरकार ने सन् 1971 में 'बाघ परियोजना' पारित किया।
जिम कार्बेट, उत्तराखंड भारत का प्रथम बाघ परियोजना क्षेत्र था। राजस्थान में प्रथम बाघ परियोजना सन् 1973 में शुरू हुई।
राष्ट्रीय उद्यान राजस्थान -
1 रणथंभौर राष्ट्रीय उद्यान सवाई माधोपुर -
सन् 1955 में "रणथंभोर अभ्यारण" बनाया गया। इसके बाद इसमें " बाघ परियोजना" की सन् 1973 में शुरुआत की । सन 1980 में रणथंभोर को "राष्ट्रीय उद्यान" बनाया गया ।
392 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में रणथंबोर राष्ट्रीय उद्यान फैला हुआ है। यह राजस्थान राज्य का 'सबसे बड़ा राष्ट्रीय उद्यान' है । इसे "बाघों का घर" भी कहा जाता है। रणथंभोर को 'राजीव गांधी राष्ट्रीय उद्यान' के नाम से भी जाना जाता है।
यहां पर "त्रिनेत्र गणेश मंदिर" स्थित है और गणेश चतुर्थी के दिन यहां पर मेला भी लगता है।
2 . केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान -
"केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान" ,भरतपुर को "घना पक्षी विहार" के नाम से भी जाना जाता है। सन 1956 में स्कोर अभ्यारण का दर्जा मिला। 27 अगस्त 1981 को इसे "राष्ट्रीय उद्यान " (National park) घोषित किया गया।
यूनेस्को ने सन् 19 85 में " kevladev National park" को राष्ट्रीय धरोहर के रूप में सूचीबद्ध किया। 29 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान फैला हुआ है।
392 प्रकार की देसी प्रजातियां , 113 प्रकार की विदेशी प्रजातियां पक्षियों की यहां पर निवास करती है। "साइबेरियन सारस" यहां का प्रमुख आकर्षण है। साइबेरियन सारस पक्षी यहां पर नवंबर माह से लेकर फरवरी तक निवास करते हैं ।केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान एशिया का सबसे बड़ा पक्षी प्रजनन केंद्र है। यहां के प्रमुख आकर्षणों में पाइथन पॉइंट कदम के वृक्ष भी है।
यहां पर एक बांध भी है और जिसका नाम है "अंजान बांध" इस बांध में "ऊदबिलाव" अर्थात् "जल मानुष" भी निवास करते हैं । यहां पर विशेष रूप से "कटु घास" पाई जाती है।
"केवलादेव" यहां पर एक प्राचीन शिवालय है इसी के नाम से केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान रखा गया। गोवर्धन परियोजना के तहत यहां पर 1994 में यमुना नदी जल का बंटवारा किया गया जिसके कारण यहां पर जल की उपलब्धि होती है एवं अतिरिक्त जलापूर्ति करौली के पांचना बांध से की जाती है।
3 मुकुंदरा हिल्स राष्ट्रीय उद्यान, कोटा सन् 2012 -
156 किलोमीटर दर्रा कोटा 37 वर्ग किलोमीटर जवाहर सागर एवं चंबल घड़ियाल अभ्यारण 5 वर्ग किलोमीटर को सम्मिलित करके 199 . 5 वर्ग किलोमीटर में इसे स्थापित किया गया। यह राजस्थान राज्य की तीसरी बाघ परियोजना है। "हीरामन तोता" विशेष रूप से यहां पर पाए जाते हैं। यहां पर विशेष रूप से "धोकड़ा" वन पाए जाते हैं ।
मुकुंदरा सिंह की प्रेमिका ' अबली मीणी का महल' , बाडोली के 'शिव मंदिर', मुकुंदरा की पहाड़ियों के 'शैल' चित्र ,भीम चोरी गुप्तकालीन रावठा का महल यहां के विशेष आकर्षण केंद्र है।
अभ्यारण -
राष्ट्रीय मरू उद्यान -
राजस्थान के सम्मिलित बाड़मेर, जैसलमेर जिलों में 3162.50 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल में फैला हुआ है। इसकी स्थापना सन 1981 में की गई। यह जीवाश्म के लिए प्रसिद्ध अकल कुंड फॉसिल पार्क स्थित है। राजस्थान राज्य पशु चिंकारा एवं राज्य पक्षी गोडावण के लिए विशेष रूप से बनाया गया है । राष्ट्रीय मरू उद्यान राजस्थान राज्य का प्रथम सबसे बड़ा अभ्यारण बनाया गया।
पीवणा सर्प, सेवण घास, अकल जीवाश्म पार्क, मारू बिल्ली यहां के विशेष आकर्षण है।
सरिस्का वन्य जीव अभ्यारण -
राजस्थान के अलवर जिले में दूसरी बाघ परियोजना की स्थापना 1978 में की गई। इसका क्षेत्रफल लगभग 492 वर्ग किलोमीटर है।
क्रासका एवं कांकनवाड़ी के पठार यहां पर स्थित है। नीलकंठ महादेव "भर्तृहरि मंदिर", "पांडुपोल हनुमान मंदिर", "ताल वृक्ष मंदिर" गरठी कामोद विराटनगर "हरे कबूतर" एवं विरासत यहां के विशेष आकर्षण केंद्र है।
कैला देवी अभ्यारण -
राजस्थान के करौली सवाई माधोपुर में 401 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला हुआ है। इसकी स्थापना सन 1983 में हुई एवं
भारत में राजस्थान राज्य के झुंझुनू जिले के खेतड़ी तहसील क्षेत्र में "वन अभ्यारण" बनाया गया है ।
सन 1991 में टाइगर रिजर्व घोषित किया गया मुख्य रूप से यह धोक वन क्षेत्र है। कुंभलगढ़ वन्य जीव अभ्यारण - राजस्थान के उदयपुर राजसमंद एवं पाली क्षेत्र में कुंभलगढ़ वन्य जीव अभ्यारण बनाया गया इसका क्षेत्रफल 610 वर्ग किलोमीटर है। विशेष आकर्षण रणकपुर के जैन मंदिर कुंभलगढ़ के भेड़िए बगीरा संरक्षण प्रस्तावित धूसर रंग के मुर्गे यहां के विशेष आकर्षण है।
फुलवारी की नाल अभ्यारण फोटडा जिला उदयपुर क्षेत्र से मानसी सोम बाकल इत्यादि नदियां निकलती है।
राजस्थान के टॉडगढ़ रावली
अभ्यारण अजमेर पाली राजसमंद के वनों में इसका क्षेत्रफल 475 वर्ग किलोमीटर है ।
सीता माता वन जीव अभ्यारण - इसका क्षेत्रफल 422 वर्ग किलोमीटर चित्तौड़गढ़ प्रतापगढ़ उदयपुर क्षेत्रों में विस्तारित है चीतल की मातृभूमि एवं उड़न गिलहरी के लिए यह स्थान प्रसिद्ध है यहां पर दो झरने एक गर्म पानी व दूसरा ठंडे पानी का बहते हैं इन झरनों का नाम लव व कुश है जाखम नदी व जाखम बांध इन्हीं जगहों पर स्थित है सर्वाधिक जैव विविधता यहीं पर मौजूद है।
सागवान के यहां पर पाए जाते हैं
रामगढ़ विषधारी अभ्यारण बूंदी जिले में स्थित है इसका क्षेत्रफल 307 वर्ग किलोमीटर है यह राज्य का एकमात्र ऐसा अभ्यारण है जिसमें बाघ परियोजना के अलावा भाग विचरण करते हैं।
इसकी स्थापना सन 1982 में की गई थी
जमवा रामगढ़ वन्य जीव अभ्यारण जिला जयपुर में स्थित है इसका क्षेत्रफल 300 वर्ग किलोमीटर दूरी में फैला हुआ है यहां मुख्यतः धोक के वन पाए जाते हैं हकहोधी रामगढ़ नामक झील यहीं पर स्थित है।
माउंट आबू वन्य जीव अभ्यारण सिरोही जिले में स्थित है इसका क्षेत्रफल 326 वर्ग किलोमीटर है यहां विशेष रूप से जल जंगली मुर्गे पाए जाते हैं अरावली पर्वत श्रेणियों की सबसे ऊंची चोटी गुरु शिखर इसी अभ्यारण में स्थित है।
राष्ट्रीय चंबल घड़ियाल अभ्यारण यह अभ्यारण सन 1979 में अरावली व विंध्याचल पर्वतों के मध्य राजस्थान उत्तर प्रदेश मध्यप्रदेश में विस्तृत है इसका क्षेत्रफल 274 वर्ग किलोमीटर है धौलपुर करौली सवाई माधोपुर कोटा एवं बूंदी क्षेत्रों में विस्तारित है यह अभ्यारण मगरमच्छ घड़ी वालों के लिए प्रसिद्ध है यहां जलीय पक्षियों की प्रजनन स्थली भी है गेपरनाथ महादेव मंदिर यहां पर स्थित है चपल गंगाई की डॉल्फिन यहीं पर पाई जाती है
भैंस रोड गढ़ जिला चित्तौड़गढ़ वन्य जीव अभ्यारण की स्थापना 1983 में की गई थी यहां पर दो प्रमुख नदियां बामणी नदी व चंबल नदी है
बंध बरेठा वन जीव अभ्यारण राजस्थान के भरतपुर जिले में सन 1985 में स्थापित किया गया था यह अभ्यारण जरखों के लिए प्रसिद्ध है यह स्थान वाटरफॉल के लिए भी प्रसिद्ध है
बस्सी वन्य जीव अभ्यारण राजस्थान के जिला चित्तौड़गढ़ में 138 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल में विस्तारित है यहां पर बहने वाली प्रमुख 2 नदियां औराई वह बामणी है राजा महाराजाओं के शिकारगाह हुआ करते थे जलेश्वर महादेव का पौराणिक स्थल यहां पर स्थित है
जवाहर सागर वन जीव अभ्यारण कोटा बूंदी चित्तौड़गढ़ क्षेत्रों में विस्तारित है इसका क्षेत्रफल 182 वर्ग किलोमीटर है विशेष रुप से गैरप नाथ का मंदिर गराडिया महादेव दर्शनीय स्थल है
नाहरगढ़ वन जीव अभ्यारण जयपुर जिले में 52 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल में फैला हुआ है इसमें विकसित जैविक उद्यान का 4 जून 2014 को लोकार्पण किया गया। जो कि राज्य का प्रथम जैविक उद्यान है यह बीयर रेस्क्यू सेंटर भी है
राम सागर वन जीव अभ्यारण 34 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्रफल में धौलपुर जिले में स्थित है इसकी स्थापना सन 1955 में की गई 4 जून सन 2014 को इसमें विकसित जैविक उद्यान का लोकार्पण किया गया यहां साइबेरियाई सारस रहते हैं
सज्जनगढ़ वन जीव अभ्यारण राज्य का सबसे छोटा अभ्यारण है इसका क्षेत्रफल मात्र 5 वर्ग किलोमीटर है यह राजस्थान के उदयपुर जिले में स्थित है इसकी स्थापना 1987 में की गई थी बड़े आकार के गुलाबों के लिए या प्रसिद्ध है यहां बांद्रा की पहाड़ी स्थित है यहां एक कृत्रिम झील जी आनासागर बड़ी झील या टाइगर झील के नाम से लोकप्रिय स्थित है जिसे मेवाड़ महाराणा राज सिंह ने अपनी माता जी जाना देवी के नाम पर बनवाया था यहां राज्य का प्रथम जैविक उद्यान विकसित किया गया है इसका लोकार्पण अप्रैल 2015 में किया गया
राजस्थान राज्य के प्रमुख मृग वन - अमृता देवी खेजड़ली, अशोक विहार जयपुर ,संजय उद्यान जयपुर, पुष्कर अजमेर दुर्ग चित्तौड़ सबसे पुराना 1969 माचिया सफारी जोधपुर, सज्जनगढ़ उदयपुर
"बांसियाल खेतड़ी कंजर्वेशन रिजर्व पार्क" पैंथरों के लिए पुनर्वास केंद्र बनाया गया है । यह पार्क 'बंधा की ढाणी' से लेकर 'बांसीयाल' तक लगभग 7000 हेक्टेयर क्षेत्र में फैला हुआ है।
राजस्थान में जिन 9 प्रोजेक्ट लेपर्ड को डेवलप किया जा रहा है उनमें झुंझुनू भी शामिल है । जिसके तहत लगभग 4000 हेक्टेयर जमीन कंजर्वेशन रिजर्व घोषित किया गया।
वर्तमान में क्षेत्र में पैंथरों के भोजन के लिए नीलगाय, जंगली गाय एवं सूअर मौजूद है। साथ ही साथ यहां पर प्राकृतिक संतुलन बनाए रखने के लिए शेर सांभर हिरण चीतल इत्यादि अन्य वन्यजीवों को भी छोड़ा गया है।
इस पूरे पार्क क्षेत्र की सुरक्षा के लिए दो चरणों में 4 फुट ऊंची लगभग 24 किलोमीटर की दूरी तक दीवार बनाई गई है। यहां के जीर्ण तालाबों का जीर्णोद्धार के करवाया गया है।
इस क्षेत्र के विलायती बबूल जोकि भूमि को बंजर बना देते हैं ,को समूल उखाड़ कर लगभग 20,000 पौधों का वृक्षारोपण किया गया है। इन पौधों को पानी पिलाने के लिए सौर पैनल लगाए गए हैं एवं बोरिंग भी करवाई गई है।
इस पार्क में पर्यटक खुली जीप में सवारी कर सकेंगे और वन्यजीवों को नजदीक से देख सकेंगे।
जयपुर में पकड़े गए बघेरों को भी यहीं छोड़ा जाता है ।