2 Poems on Corona | Corona par 2 kavitayein

 एक नई सुबह के साथ नया डर था

चारों ओर कोरोना का कहर था

अच्छे बुरे सब चलने बने

           कुछ पराए और कुछ अपनी

सीएम की सांसे धीमी होती गईं

           उम्मीद की किरण में सोती गई

सब पौधे दोस्त हमारे

सब डर गए कोरोना के मारे

पढ़ाई लिखाई अब हो गई बंद

 दुनिया में था कोरोना बुलन्द

मार्च , मई जून सब बीत गए

 सिक्ख हो या अंग्रेज सब बीत गए

 लाहौर पंजाब हरियाणा

         किसी ने कोरोना को न माना।



बीमारी तोड़ देती है इंसान की मति सारी

हानि होती है भारी

जब आया कोरोना

  पड़ा दुनिया को  रोना

कुछ अच्छा कुछ बुरा

जिसकी सहनशीलता को ललकारा

चिकित्सा में मोटा पैसा कमाया

और गरीबों ने अपनों को गंवाया

कई आए कई गए

जो थे कोरोना से ग्रस्त

गहरी नींद सो गए

गरीब लोग भूखे मरते

नेता भी फायदा उठाकर

नित नहीं वादे करते

सबको याद आया कसरत और योगा

करने लगे भविष्यवाणी लोग पहन के जोगा

सबने अच्छा मौका पाया

कुछ नहीं कोरोना का बहाना बनाया

सब ने उंगली उठाई

कोरोना की वजह चीन की छेड़छाड़ बताई ।