Makar Sankranti Kavita | मकर संक्रांति पर कविता

 

makar sankranti kavita


किसने कहा पतंग उड़ाना आसान है,
   पतंग उड़ाना होता है कठिन ।


रंग बिरंगी पतंगों से भरा आसमान है,
आज सूर्योदय से पूर्व उठकर ।


 नहा - धोकर तैयार होकर,
लें चरखी- मांझा, रंग-बिरंगी पतंग ।


साथ में खाने- पीने का भी सामान है,
गए जैसे ही छत पर,
किसी ने कहा नीचे आओ,
हम गए डर !
क्योंकि आवाज थी बड़ी भयंकर  ।


पहले पापा ने बोला बीमार पड़ जाओगे,
फिर बाबा ने बोला नीचे गिर जाओगे,
एक-एक कर सब ने डांट लगाई,
वह चाहे मम्मी बुआ ताऊ हो या ताई।


डांट कर लग गए सब काम पे, 
मौका पाकर चल गए छत पे,
बच्चे थे हम  ****  गांम  के,
किसने कहा पतंग उड़ाना आसान है ?
पतंग उड़ाना होता है कठिन ।


आज रंग बिरंगी पतंगों से भरा आसमान है।
पहले पतंग में ताना डाला,
चरखे से धागा निकालकर,
छुट्टी दे जनाब 
पेड़ आ गया बीच में, मानो हो जैसे
हड्डी में कबाब ।


थोड़ी देर ठहर का हवा ने रुख मोड़ा ,
तभी कोरव ने अपने दांतो से पतंग को तोड़ा ।


फिर दादी ने खाने के लिए आवाज लगाई 
हमने बड़ी मुश्किल से पतंग चढ़ाई ‌।


हमने मांझा नहीं खरीदा,
सादा धागा वह भी उड़ाया संभल कर
निर्दोष पक्षी मर जाते हैं,
चाइनीज धागे से कटकर।


पतंग उड़ाते उड़ाते शाम हो गई,
यह दुनिया दान धर्म में खो गई।


सीएम छत से नीचे आया,
रसोई के सामने तिल लड्डू, 
के लिए धरना लगाया ।


5-6 लड्डू खाकर, 
गए तो देखा कि,
व्हाट्सएप पर कुछ बंदर बैठे हैं !
मुंह लटका कर,
हमने पूछा तो कहा कि,
पहले घरवालों से जाने नहीं दिया !
अब चोट लगी तो जा नहीं सकते।


गए तो विश्वास था कि जरूर बीमार पड़ते।
जैसे तैसे छत पर गए,
पहले तो पतंग उड़ी नहीं,
उड़ी तो मन खुशी से भरा,
पड़ोसी के धागे से फिर कटी तो मुंह उतरा।


फिर सीएम ने कहा,
सब घर की है यही कहानी,
हमें तो डांट खाकर पतंग उड़ा कर
खट्टी मीठी यादों के साथ है संक्रांति मनाना।        

                 written by -super CM