Rajasthan mein Panch Peer ke lok Devta | राजस्थान के लोक देवता

 


जिन महापुरुषों ने धेनु ,धर्म और धरा की रक्षा हेतु कार्य किए और संघर्ष करते हुए आत्म - बलिदान दिया उन्हें लोक देवता ने कहा है। मंदिरों की स्थापना की जाती है और इनकी पूजा की जाती है प्रसिद्ध मेले भी लगते हैं।


राजस्थान के पंच पीर - 
 लोगों ने जिन व्यक्तियों को देवता के समान मान लिया है उन्हें लोक देवता कहते हैं किसी व्यक्ति के अच्छे कार्यों को देख कर उसके आध्यात्मिक व्यवहार को देखकर लोगों द्वारा उन्हें देवता मान लिया जाता है उन्हें  लोक देवता कहते हैं जिस प्रकार हिंदू धर्म में लोक देवताओं की पूजा की जाती है उसी प्रकार मुस्लिम लोगों में भी पीर बाबा  की पूजा की जाती है राजस्थान के ऐसे पांच लोक देवता हैं जिन्हें मुस्लिम लोग भी उन्हें पीर समझ कर उनकी पूजा करते हैं उन्हीं लोक देवताओं को पंच पीर कहा जाता है ।
पंच पीर -: 
🔵 रामदेव जी , रामसापीर
🔵 गोगाजी
🔵 पाबूजी 
🔵 हड़बूजी
🔵 मेहा जी

इलो जी - 

कल्ला राठौड़ -

कुछ ऐसे व्यक्ति जिन्होंने समाज के हितार्थ गोवंश की रक्षा दलित की उद्धार और धर्म की रक्षा के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और साथ ही अपने प्राणों का बलिदान भी किया इन गोगाजी, तेजाजी व पाबूजी का नाम मुख्य रूप से आता है। इनकी वीरता और समाज के लिए हितकारी कार्यों को देखने वाली जनता ने उन्हें लोक देवता की उपाधि देकर इनकी प्रार्थना और पूजन किया।

अनेकों ऐसे सिद्धि व्यक्ति हुए जिन्होंने अपनी वीरता चमत्कार वरसिध्दी से जनजातियों को प्रभावित किया इन्हें हड़बूजी,देवनारायण जी और मल्लीनाथ जी विशेष रूप से पूजे जाते हैं यह सभी अरावली के देवता या राजस्थान के लोक देवता की श्रेणी में आते हैं।


1 ✴️ देवनारायण जी - 

               देवनारायण जी की गिनती मुख्य अरावली के या राजस्थान के लोक देवताओं में होती है। यह नागवंशी गुर्जर थे। इनका मूल स्थान वर्तमान के अजमेर के निकट नाग पर्वत था। समाज में प्रचलित लोक कथाओं के माध्यम से गुर्जर जाति के वीर पुरुष देवनारायण जी के संबंध में विस्तार से जानकारी मिलती है। "देवनारायण महागाथा" में इनको "चौहान" वंश से संबंधित कहा गया है।देवनारायण की फड़ के अनुसार मंडल जी के हीराराम हीरारम के भाग सिंह और बाघ सिंह के 24 पुत्र हुए जो 'बगड़ावत'कहलाए इन् उसी में से बड़े भाई सवाई भोज और माता साडू के पुत्र के रूप में विक्रम संवत 968 (911 ईस्वी) में माघ शुक्ल सप्तमी को। । देवनारायण जी का जन्म भूमिसेरी में हुआ था। 

        देवनारायण जी एक वीर राजकुमार थे। उन्होंने अत्याचारी शासकों के खिलाफ कई संघर्ष और युद्ध किए थे। शासन ने भी किया। उन्होंने कई सिद्धियाँ भी प्राप्त कीं। उनके द्वारा किए गए चमत्कारों के कारण धीरे धीरे यह गुर्जरों के लोक देवता के रूप में पूजनीय बन गए। देवनारायण जी को विष्णु का अवतार भी माना जाता है और गुर्जर समाज में आरक्षित व दक्षिण पश्चिमी मध्य प्रदेश के क्षेत्र में इनकी पूजा की जाती है।में उसने जनता के दुखों और दुखों को दूर किया।



      देवनारायण जी ने अपना अंतिम समय ब्यावर तहसील के मसूदा से 6 किलोमीटर दूरी पर स्थित देवमाली स्थान पर व्यतीत किया। भाद्रपद शुक्ला सप्तमी के दिन उन्होंने अपनी देह त्याग दी है। देवनारायण जी ने गौ रक्षा की थी। में उन्होंने बगड़ावतों की पांच गाथाओं सहित साधारण गायों से विशेष भिन्न तरीकों के लक्षण थे, खोजा। बगड़ावतों के गुरु रूपनाथ ने "सरेमाता" गाय सवाई भोज को दी थी देवनारायण जी नित्य प्रात: काल उठते ही इस गाय के दर्शन करते थे। देवनारायण जी के पास लगभग 98000 पशु थे। राण भिणाय का राणा जब भी गायों को घेर कर ले जाता है तो देवनारायण जी उन गायों की रक्षा के लिए राणा से युद्ध लड़कर गायों को छुड़ाकर लाते थे। इनकी सेना में उन की संख्या लगभग 1444 थी इनका काम गायों की देखभाल, करना चराना, और इनकी रक्षा करना था।देवनारायण जी की सेना में उन की संख्या अधिक थी।देवनारायण जी ने अपने अनुयायियों को गौ रक्षा का संदेश दिया ।

राजस्थान में वनस्पति


       अपने जीवन में बुराइयों से लड़कर अच्छाई को जन्म दिया। सच्चाई की रक्षा के लिए आतंकवाद से संघर्ष किया और शांति स्थापित की। राजस्थान में स्थान स्थान पर उनके लिए देवालय बनाए गए हैं जिनको "देवरा" कहा जाता है। टोंक, चित्तौड़, भीलवाड़ा व अजमेर में यह देवरी काफी अधिक संख्या में है। देवनारायण जी का मुख्य मंदिर भीलवाड़ा जिले के आसींद कस्बे के पास खारी नदी के तट पर सवाई भोज में स्थित है। देवनारायण जी का एक और प्रमुख देवालय निवाई तहसील के जोधपुरिया गांव में वनस्थली से 9 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। देवनारायण जी की पूजा भोपा करते हैं यह भोपा कई स्थानों पर चलते गुर्जर समाज के मध्य "फड़" (लपेटे हुए कपड़े पर देवनारायण जी की झलक गाथा) के द्वारा देवनारायण जी की कथा गाकर सुनाते हैं।

      इनकी "फड़" में 335 लिखी गई ये कविता लगभग 1200 पृष्ठों की है। राजस्थान की "फड़ों" में सबसे अधिक लोकप्रिय देवनारायण की "फड़" है।

  २.✴ तेजाजी -

 राजस्थान के नागौर जिले "खरनालिया" गांव के रहने वाले थे "तेजाजी" ।  विक्रम संवत 1130 में माघ शुक्ला चतुर्दशी के दिन इनका जन्म हुआ। बाल विवाह होने के कारण यह अपने विवाह से अनभिज्ञ थे । एक दिन यह खेत पर हल चला रहे थे तो उस दिन उनकी भाभी खाना लेकर खेत पर देर से पहुंची तो तेजाजी ने देरी होने का कारण पूछा तब उत्तर में भाभी ने कहा कि - "तुम्हारी पत्नी तो मायके में बैठी मजे कर रही है और मैं यहां दिन भर काम करती हूं।"तेजा जी को उनकी यह बात बुरी लगी और अपने ससुराल का पता पूछ कर बिना खाना खाए घोड़ी पर सवार होकर ससुराल चल पड़े  । ससुराल पहुंचने पर उन्होंने देखा कि उनकी सास गाय का दूध निकाल रहीं हैं घोड़े के खुरों की आवाज से दूध देती गाय  बिदक गई  । गाय भी बिदकने पर उनकी सास गुस्से में आकर बोली कि - "नाग - रौ झाटियोड़ो तो कुण है ? जणी गाया ने भिड़का दी ।" तेजाजी को यह सुनकर बहुत बुरा लगा । और वे तुरंत वहां से चले गए जब ससुराल वालों को इस बात का पता चला तो तेजाजी को रोकने के बहुत प्रयास किए , किंतु वह नहीं रुके । तब उनकी पत्नी ने बहुत ही कठिनाई से उनको एक रात रुकने के लिए  प्रयत्न किया किंतु उन्होंने अपनी पत्नी से कहा कि - "मैं ससुराल में नहीं ठहरूंगा ।" आखिरकार रात को "लांछा" नामक गुजरी के यहां रुके । रात के समय "लांछा" गुजरी की गायों को कुछ चोर चुरा ले गए । जब तेजा जी को पता चला तो वह घोड़ी पर सवार होकर चोरों के पीछे भागे । राह में उनको एक सांप जलता हुआ लकड़ी के ढेर में दिखाई दिया तो उन्होंने भाले की नोक से सांप को बाहर निकाला तब सांप बोला - "मैं तुझे डसूंगा !" तब तेजाजी बोले "मैं गायों को छुड़ाकर आ जाऊं तब मुझे डसना।" जब गायों को छुड़ाकर तेजाजी वापस आए तो चोरों से लड़ाई करने के कारण उनका सारा शरीर खून से लथपथ था तो सांप ने कहा - "तुम्हारे पूरे शरीर पर खून ही खून है मैं तुम्हें कौन सी जगह पर डसूं ?" तब तेजाजी ने अपने मुख से जीभ निकालकर कहा "कि मेरी जीभ पर डसो ।" सांप ने उनको डसा और उनका देहावसान हो गया । उनकी पत्नी सती हो गई । तेजाजी गायन छुड़ाने और वचन पालन करने के कारण प्रसिद्ध हो गए जगह-जगह इनके स्थानक बन गए इनके स्थानों पर सर्पदंश से पीड़ित व्यक्ति अपना इलाज कराने आते हैं । तेजाजी की स्मृति में भाद्रपद शुक्ला दशमी को मेला भरता है और हजारों की संख्या में लोग मेले में आकर लोक देवता तेजा जी की पूजा - अर्चना करते हैं ।

३.✴ रामदेव जी 

            लोक देवताओं में अत्यधिक लोकप्रिय रामदेव जी का जन्म 15वीं शताब्दी में हुआ था ।  इनके पिता का नाम "अजमल जी " एवं माता का नाम    " मैणा देवी " था । इनका जन्म स्थान पोकरण के निकट रुणीचा गांव है ।  गौ  - संरक्षक  बाबा रामदेव जी "रामसापीर" ने सिद्ध संत शूरवीर , कर्त्तव्यपरायण , चमत्कारी जनता के रक्षक के रूप में ख्याति प्राप्त की । इन्होंने जाति व्यवस्था के विरुद्ध होकर सामाजिक एकता और समरसता का संदेश दिया ।

       रामदेव जी ने गुरु महिमा, जीवों पर दया,मानव गौरव एवं पुरुषार्थ  की महत्ता स्थापित की । यह जातिवाद के विरोधी थे । अछूत कह जाने वाली जातियों के साथ बैठकर यह भजन कीर्तन किया करते थे । डाली बाई जो कि दलित थी उनको बहन के रूप में पालन पोषण करना एवं हिंदू मुस्लिम एकता पर बल देना आदि इन के मुख्य कार्य थे । रामदेव जी ने गुरु की महिमा पर जोर देते हुए कर्मों की शुद्धता पर बल दिया । बाबा रामदेवजी गायों के रक्षक परोपकारी और लोक देवता के रूप में पूजे जाते हैं। राजस्थान के अलावा गुजरातमध्यप्रदेश में भी इनकी पूजा की जाती है । इन्होंने सामाजिक सौहार्द पर बल दिया और यह प्रतीक बन गए। बाबा रामदेव जीके एक हाथ में तंदूरा वह दूसरे हाथ में भाला भक्ति एवं शक्ति के प्रतीक हैं । उनकी समाधि पर निर्मित मंदिर, पर्ण़ बावड़ी, डाली बाई की समाधि का मंदिर आदि स्मारक माने जाते हैं। अनेकों गांव में रामदेव जी के मंदिर व स्थान स्थित है। खेजड़ी वृक्ष नीचे चबूतरे पर रामदेव जी के पगल्या स्थापित किए जाते हैं। इनके मंदिरों को देवरिया देवरा के नाम से जाना जाता है।

४.✴ पाबूजी - 

                  पाबूजी राठौड़ का निवास स्थान कोल्हूगढ़ था । डामा और चांदा नाम के दो वीर इनके प्रमुख सहयोगी थे। पाबूजी के युवा होने पर अमरकोट के सोडा राणा के यहां से सगाई का  नारियल आया । उनकी सगाई तय हो गई। देवल नामक एक चारण देवी को पाबूजी ने अपनी बहन बना रखा था। देवल जी के पास एक बहुत सुंदर और सर्वगुण संपन्न घोड़ी भी थी जिसका नाम केसर कालवी था। इनकी बहन देवल अपनी गायों की रखवाली इस गोली से ही किया करती थी। इस घोड़ी पर जायल के जिंद राव खींची की बुरी नजर थी वह इसे हथियाना चाहता था । पाबूजी और जिंद राव मैं किसी बात को लेकर मनमुटाव भी था ।

   विवाह के समय बाबूजी ने देवल देवी से यह घोड़ी मांगी। देवल नहीं जिंद राव की बात पाबूजी को बताई तब पाबूजी ने कहा की जरूरत पड़ेगी तो मैं अपना कार्य बीच में ही छोड़ कर आ जाऊंगा। देवल ने आज स्वस्थ होकर घोड़ी बाबूजी को सौंप दी। जब बारात अमरकोट पहुंचे जिन्होंने मौका देखा और देवल देवी की गायों को लेकर भाग गया। पाबूजी जो विवाह के फेरे ले रहे थे तब देवल के समाचार बाबूजी को प्राप्त हुए कि जिन राव उसकी गाय लेकर भाग गया है। इतना समाचार सुनते ही अपने वचन को निभाते हुए शादी के फेरे बीच में ही छोड़कर केसर कालवी घोड़ी पर बैठकर पाबूजी ने जिंद राव का पीछा किया। बाबू जी ने गायों को तो मुक्त करा लिया किंतु पाबूजी खेत रहे। अर्ध विवाहित सोढी़ पाबूजी के साथ सती हो गई। पाबूजी की फड़ में इनकी यह गाथा संकलित है। इनका वचन लोकप्रिय है। और इनकी लोक देवता के रूप में पूजा अर्चना की जाती है।

५.✴ गोगाजी- 

             गोगा जी का पूरा नाम गोगा जी चौहान था। यह लिंगवा (चूरू) के निवासी थे। उनके पिता जी का नाम "जेंहवर" और माता का नाम "बाइल" था। उनके माताजी गोरखनाथ के भक्त थे। बाइल की सेवा से खुश होकर गोरखनाथ बाबा ने धूप से बना सर्प दिया और कहा कि इसे घोलकर पी जाना परिणाम स्वरूप गोगा दे का जन्म हुआ। पाबूजी के बड़े भाई गुरु जी की पुत्री कैमलदे से गोगादे विवाह करना चाहते थे। किंतु बूड़ो जी यह नहीं चाहते थे। 1 दिन गोगाजी नहीं सर्प का रूप धारण किया और फूलों के बीच में बैठ गए। जब कैमल दे इच्छा शुरू हुई तो उस सांप ने उसे डस लिया। अंत में गोगा जी के अभिमंत्रित पुरस्कार को कैमल देकर बांधने से ऊपर ठीक हो गए और दोनों का विवाह हो गया।

      दिल्ली के सुल्तान फिरोजशाह से गोगा जी ने युद्ध किया। इस युद्ध में गोगा जी के दो मौसेरे भाई सरजन व अर्जुन बादशाह के समर्थन में लड़ रहे थे वे दोनों मारे गए यह बात उन्होंने अपनी माता जी को बताईए तो गोगा जी की माता जी उनसे बहुत नाराज हुई और बुआ जी के घर से चले गए और मुंह नहीं दिखाने के लिए कहा। बुआ जी को यह बहुत बुरा लगा और जीवित ही समाधि ले ली। भाद्रपद की कृष्ण पक्ष की नवमी को गोगा नवमी के रूप में मनाई जाती है और वीर पुरुष के रूप में इनकी पूजा की जाती है। हल चलाने के समय हल व हाली दोनों के 9 गांठ वाली गोगा राखी बांधी जाती है। रतनगढ़ चूरू चिपवा व राजगढ़ आदि क्षेत्रों में गोगा जी के मेले लगते हैं। गोगा जी के थान को गोगामेडी कहा जाता है जो इंद्र मानगढ़ों में स्थित है।

हड़बूजी -

 राजस्थान के पंच 'पीरों' में से एक है । और यह मारवाड़ के शासक राव जोधा के (सन् 1438 से 1489) समकालीन थे । हड़बूजी का जन्म नागौर जिले के भुंडेल गांव में हुआ था। इनके पिता जी का नाम था मेहराज सांखला । हड़बूजी का उपनाम 'शगुन शास्त्री' भी था । इनकी माता जी का नाम 'सौभाग' था। और इन के गुरु जी का नाम था 'गुरु बालीनाथ' जी । हड़बूजी रामदेव जी व जम्भौजी के मौसेरे भाई थे । और रामदेव जी के कहने पर ही इन्होंने बालीनाथ जी को अपना गुरु बनाया।

हड़बूजी सांखला असमर्थ गायों के लिए बैलगाड़ी में रखकर चारा लाया करते थे तथा उनको चारा खिलाया करते थे । हड़बूजी सांखला का मुख्य मंदिर बेंगटी गांव (फलोदी- जोधपुर) में स्थित है । बेंगटी गांव में इन की मूर्ति की पूजा नहीं होती है बल्कि बैलगाड़ी को इनका प्रतीक मानकर पूजा की जाती है । हड़बूजी की पूजा करने वाला पुजारी सांखला राजपूत ही होता है । हड़बूजी का वाहन 'सियार' है । बेंगटी गांव के मंदिर का निर्माण जोधपुर (मारवाड़) के शासक अजीत सिंह राठौड़ द्वारा कराया गया था । ऐसा बताया जाता है कि अजीत सिंह राठौड़ वही शासक थे जिनकी 1724 ईस्वी में उनके पुत्र बख्त सिंह ने हत्या कर दी थी । 

हड़बूजी ने राव जोधा को एक कटार देकर मारवाड़ प्राप्ति का आशीर्वाद दिया । राव जोधा के पूर्वज मारवाड़ को हार गए थे इसलिए राव जोधा मारवाड़ को पुनः प्राप्त करना चाहते थे। राव जोधा ने मारवाड़ प्राप्ति के लिए बार-बार युद्ध भी किए किंतु उन्हें बार-बार हार का सामना करना पड़ता था अंततः उन्होंने हड़बूजी का आशीर्वाद लिया और हड़बूजी ने आशीर्वाद स्वरुप राव जोधा को  एक कटार प्रदान की । हड़बूजी के आशीर्वाद के कारण राव जोधा ने मारवाड़ विजय प्राप्त कर ली और सौभाग्य वश राव जोधा ने हड़बूजी को उपहार में बैंगटी गांव दिया । 

रामदेव जी ने अपने मौसेरे भाई हड़बूजी के बारे में अपनी लिखी हुई किताब '24 वाणियां' में लिखा है कि 

हड़बूजी सांखला हरदम हाजिर गांव बेंगटी माही ।

दूजी देह म्हारी ही जाणो हां मौसी जाया भाई । 

जब रामदेव जी ने समाधि ली (भाद्रपद शुक्ल पक्ष एकादशी) उनके आठ दिन बाद ही हड़बूजी ने समाधि ले ली ।

 

मेहा जी मांगलिया - 

                 मेहा जी मांगलिया पंच पीरों में से एक थे । राव चूड़ा (1384 से 1423) मारवाड़ के एक शासक थे उनके ही समकालीन मेहाजी मांगलिया थे । मेहा जी के गोत्र को लेकर इतिहासकारों ने अलग-अलग मत प्रकट किए हैं । (गोत्र जो कि किसी भी व्यक्ति की वंशावली बताता है) जन्म के आधार पर इनका गोत्र अलग बताया जाता है इनके पिता जी का नाम गोपाल राज सांखला था इस प्रकार इनके जन्म के आधार पर यह सांखला गोत्र के हुए ।मेहा जी का पालन पोषण ननिहाल में हुआ था और इनका ननिहाल पक्ष का गोत्र मांगलिया था । इसलिए ननिहाल पक्ष में पालन-पोषण होने के कारण इन्होंने मांग लिया गोत्र लगाया । इनका प्रसिद्ध मंदिर जोधपुर के बापड़ी गांव में स्थित है और वहां पर बहुत बड़ा मेला लगता है भाद्रपद कृष्ण पक्ष अष्टमी के दिन यानी कि  कृष्णा जन्माष्टमी के दिन।

6 . इलो जी - 

इलो जी की पूजा मुख्य रूप से मारवाड़ में की जाती है इनको छेड़छाड़ का देवता भी कहा जाता है । वैवाहिक या दांपत्य जीवन को सुखमय बनाने के लिए इनकी पूजा की जाती है ।

ऐसी किंवदंती है कि हिरण्कश्यप की बहन जोकि होली का थी और उसका विवाह इलोजी के साथ तय हो गया था किंतु विवाह होने से पूर्व ही होलिका की मृत्यु हो गई थी । होलिका को वरदान स्वरूप एक ओढ़नी मिली थी जिसे ओढ़ने पर अग्नि का कोई असर नहीं होता था इस कारण हिरण्यकश्यप ने अपने पुत्र भक्त प्रहलाद को मारने के लिए होलिका को पहलाद को गोदी में लेकर अग्नि में बैठ जाने का आदेश दिया ताकि प्रहलाद की मृत्यु हो जाए और होलिका का कुछ ना बिगड़े किंतु प्रभु की कृपा से वह ओढनी प्रहलाद के ऊपर आ गई और होलिका का दहन हो गया जिस कारण से उसकी मृत्यु हो गई । जब यह बात इलोजी को पता चली तो वह बहुत नाराज हुए और उस स्थान पर पहुंचे जहां पर की होलिका का दहन हुआ था और उन्होंने अपने सारे वस्त्र निकाल कर फेंक दिए फिर होलिका की जो बची हुई रात थी उसको अपने देश पर मरने लगे। ऐसी लोक मान्यता है कि

7. कल्ला राठौड़ -

 इनको 4 हाथों वाले या दो सिर वाले देवता भी कहा जाता है । और इनको 'शेषनाग जी' का अवतार भी माना जाता है । इनका जन्म सन् 1544 में मेड़ता-नागौर के 'सामियान' ग्राम में हुआ था । इनके पिता जी का नाम कई किताबों में आस सिंह या कई किताबों में अचल सिंह भी बताया  जाता है । की माता का नाम 'श्वेत कंवर' था । कल्ला राठौड़ के ताऊ का नाम था जयमल राठौड़ । और कला राठौर की बुआ की मीराबाई । मीराबाई को राजस्थान की राधा भी कहा जाता है । सन् 1567-68 में अकबर ने चित्तौड़ दुर्ग पर आक्रमण कर दिया। महाराणा उदय सिंह उस समय चित्तौड़ के शासक थे । और उनके सेनानायक थे जयमल फत्ता यानी कि जयमल राठौड़ एवं फत्ता सिसोदिया । 

इस युद्ध में महाराणा उदय सिंह को पहले ही सुरक्षित गोगुंदा भेज दिया गया था । वर्तमान के उदयपुर में गोगुंदा शहर आता है । और उदयपुर को महाराणा उदय सिंह ने ही बसाया था जो कि महाराणा प्रताप के पिता थे । 

योद्धाओं ने इस युद्ध में चित्तौड़ के दुर्ग के द्वार बंद कर रखे थे क्योंकि अकबर की सेना चित्तौड़ की सेना के मुकाबले में बहुत बड़ी थी और अकबर की सेना के सामने चित्तौड़ की सेना का जीतना नामुमकिन था । अकबर की सेना ने दुर्ग को चारों तरफ से घेर रखा था । और चारों तरफ से किले की दीवारों को तोड़ने के लिए तोप के गोले चलाए जा रहे थे जिससे कि किले की दीवारें क्षतिग्रस्त हो चुकी थी क्षतिग्रस्त दीवारों की मरम्मत कराने का कार्य जयमल राठौड़ की जिम्मेदारी थी । और जयपाल राठौड़ कल्ला राठौर के ताऊ थे । मरम्मत का कार्य कराते समय जयमल राठौड़ के पैर में 1तीर आकर लगा जिससे कि उनका पैर घायल हो गया और वह चलने फिरने की स्थिति में नहीं रहे या युद्ध करने की स्थिति में नहीं रहे ।

कल्ला राठौड़ ने अपने ताऊ को अपने कंधे पर बिठा लिया और मुगल सेना से युद्ध करने के लिए दुर्ग से बाहर आ गए ।

कल्ला राठौड़ के कंधे पर बैठे हुए जयमल राठौड़ के हाथ में दो तलवारें थी एवं कला राठौर के हाथ में भी दो तलवारें थी कुल मिलाकर 4 तलवारे हो गई । मुगल सेना के सैनिकों को लगा कि चित्तौड़ की तरफ से कोई चार हाथों वाला  एवं दो सिर वाला देवता युद्ध करने आया है ।

इसी कारण से इनको दो सिर वाला एवं चार हाथ वाला देवता कहा जाता है ।


कला राठौड़ को जड़ी बूटियों का अच्छा ज्ञान था । यदि कोई बीमार होता था तो यह उसका इलाज स्वयं करते थे और उनको जड़ी बूटियां भी बता देते थे । इनको योग का ज्ञान भी भली-भांति था ।(  21 जून को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस मनाया जाता है  । 11 दिसंबर 1914 में संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा द्वारा प्रस्ताव पारित कर 21 जून को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस का दर्जा दिया गया।  ) । कला राठौड़ जी ने योग की शिक्षा अपने गुरु भैरव नाथ जी से ली थी । कला राठौड़ जी की प्रमुख फीट यानी प्रमुख स्थान रनेला है। दूसरा इनका प्रमुख स्थान है डूंगरपुर के सामलिया  गांव में यहां पर इनकी काले पत्थर की मूर्ति बनी हुई है जहां पर की केसर चढ़ाया जाता है। इनकी छतरी चित्तौड़ के दुर्ग भैरव पोल में है और यहीं पर हर साल आश्विन शुक्ल पक्ष नवमी के दिन मेला लगता है ।