राजस्थान की भौगोलिक स्थिति | Rajasthan ka bhogolik swaroop

 

     


   क्षेत्रफल की दृष्टि से पंजीकृत भारत का सबसे बड़ा राज्य है।  राजस्थान में अरावली भूमि के पश्चिम में शुष्क और प्राकृतिक शुष्क मैदान पाए जाते हैं। अरावली पर्वत श्रंखला विश्व की प्राचीनतम पर्वत श्रृंखलाएँ हैं। अरावली पर्वत श्रंखला की मुख्य जलप्रपात है। पहाड़ के धरातलीय स्वरुप में पर्वत, पातर, मैदान और मरुस्थल पाए जाते हैं। भोजोलिक दृष्टि से पाँच भागों में बांटा गया है: -

1.पश्चिमी मरुस्थल प्रदेश 

2. शुष्क प्रदेश 

3. अरावली प्रदेश

4. पूर्वी मैदानी प्रदेश 

5. दक्षिणी-पूर्वी पठारी क्षेत्र।

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1.पश्चिमी मरुस्थल प्रदेश: - इस प्रदेश को तीन समानांतर भागों में बांटा जा सकता है जो पश्चिम से पूर्व की ओर हुआ है।] यहां रेत (बालू) के टीले पाए जाते हैं, इनको स्थानीय भाषा में "धोरे" कहा जाता है। । इस क्षेत्र में बीकानेर, बाड़मेर, जैसलमेर, व जोधपुर जिले में स्थित है। इंदिरा गांधी नहर परियोजना से यहां की परिस्थितियों में बदलाव आया है।


2. शुष्क शुष्क प्रदेश: - ये क्षेत्र अरावली पहाड़ियों के पश्चिम में उत्तर - पूर्व से दक्षिण तक फैला हुआ है। यहां की औसत ऊंचाई लगभग 300 से 450 मीटर है। इस क्षेत्र के अंतर्गत जोधपुर का पूर्वी भाग, सिरोही, पाली, जालोर नागोर, झुंझुनूं, सीकर, गंगानगर, हनुमानगढ़, चूरू जिले आते हैं। 

rajasthan ke lok devta

3. अरावली प्रदेश: - ये पर्वत श्रृंखलाएँ आग्नेय टुकड़ों के आड़े वलय से बने होने के कारण आड़ावाल के नाम से जाना जाता है। आर्यों का निवास स्थान होने के कारण अंग्रेजों ने इसे "आर्यन वेली" का नाम दिया। ये पहाड़ियां उत्तर में दिल्ली से लेकर दक्षिण में गुजरात के खेड़ब्रह्म तक 692 किलोमीटर की लम्बाई में विस्तृत है। इनकी ऊंचाई दक्षिण - पश्चिम में अधिक है और उत्तर - पूर्व की ओर कम ऊंचाई वाली त्योहार हैं। सिरोही जिले में माउंट आबू के पास गुरुशंकर सबसे अधिक (1722 मीटर) शीर्ष है। इसे उत्तर - पूर्वी पहाड़ी, मध्य अरावली, मेवाड़ की पहाड़ियों या भोराट पठार और अबू पर्वतीय क्षेत्रों में काट दिया गया है।

मध्यवर्ती अरावली प्रदेश 

राजस्थान गांव क्षेत्र जिस पर अरावली की पहाड़ियां स्थित है। राजस्थान के लिए अरावली की पहाड़ियां बहुत ही महत्वपूर्ण है । यह पहाड़ियां राजस्थान के भौतिक प्रदेश को विभाजित करती हैं । राजस्थान के पश्चिम में मरुस्थल है अरावली के पूर्व में मैदानी भाग हैं और अरावली के दक्षिण पूर्व में है पठारी भाग ।

अरावली रेंज

 इस प्रकार राजस्थान के भौतिक प्रदेश को विभाजित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है अरावली - 

1 - भारत और राजस्थान के मानसून को प्रभावित करती है अरावली की श्रृंखलाएं राजस्थान में अलवर से शुरू कर सिरोही तक अरावली की श्रंखलाएं जाती है ।

2 - अपवहन तंत्र  को प्रभावित करती हैं 

अरावली के पश्चिम में बहने वाली नदियां अरब सागर में जाकर मिलती हैं और अरावली के पूर्व में बहने वाली नदियां बंगाल की खाड़ी में जाकर मिलती है। इस प्रकार राजस्थान के अपवाह तंत्र को अरावली की पहाड़ियां प्रभावित करती हैं ।

अरावली की पहाड़ियों से अनेक नदियों का उद्गम होता है उनमें से एक मुख्य नदी है लूणी नदी जो कि अजमेर के नाग पर्वत से निकलती है । बैराठ की पहाड़ियों से भी अनेकों नदियां निकलती है । 

3 - उद्योगों को प्रभावित करती हैं- अरावली में ग्रेनाइट और क्वार्टजाइट पत्थर पाया जाता है इसके अलावा मार्बल पत्थर चूना पत्थर बलुआ पत्थर भी पाया जाता है यहां पर धात्विक खनिज भी पाए जाते हैं।

4 - सामाजिक और सांस्कृतिक प्रभाव- अरावली के दक्षिणी भाग में बहुत सारी जनजातियां रहती हैं जैसे भी मीणा और डामोर जनजातियां रहती हैं ।

विस्तार- अरावली की पहाड़ियों का विस्तार राजस्थान के 13 जिलों में है - अलवर सीकर जयपुर झुंझुनू अजमेर पाली सिरोही डूंगरपुर उदयपुर प्रतापगढ़ चित्तौड़ भीलवाड़ा और राजसमंद। सिरोही से लेकर अलवर तक राजस्थान में इसकी लंबाई 550 किलोमीटर है । अरावली का 80% भाग राजस्थान में स्थित है । 

गुजरात के खेडब्रह्मा पालनपुर से खेतड़ी सिंघाना तक अरावली सतत रूप में (continuous) स्थित है इसके बाद छोटी-छोटी पहाड़ियों में अरावली पाई जाती है। 


अरावली पर्वत के पूर्वी कोने में क्या है?

4. पूर्वी मैदानी प्रदेश: - यह क्षेत्र में अरावली पर्वत श्रृंखलाओं के पूर्वी भाग में स्थित है जिसमें मुख्यत: चम्बल की घाटी, माही और बनास की घाटी शामिल हैं। चम्बल घाटी में बाढ़ के मैदान नदी तट बीहड़ और अदृश्य नदियां पारी जाती हैं बनास घाटी दो भागों में मालपुरा -करौली मैदान व मेवाड़ मैदान में बंटा हुआ है। इसके दक्षिणी भाग में माही वे बनास प्रमुख नदियाँ हैं।

अरावली पहाड़ियों के नाम का दक्षिणी भाग

5. दक्षिणी-पूर्वी पठारी क्षेत्र: - इसको हाड़ौती पठार के नाम से भी जाना जाता है। यह कोटा, झालावाड़, बूंदी बारां ज़िलों तक फैला हुआ है। यहां काली मिट्टी पाई जाती है जो कि उपजाऊ होती है। चम्बल नदी पर भैंसरोड़गढ़ के पास प्रसिद्ध "चुलिया जल प्रपात (झरना)" है। इस भाग में मुकंदरा व बूंदी की पहाड़ियाँ चयनित हैं।

अरावली प्रदेश में वन संरक्षण योजनाएँ हैं 

भारत में सबसे पहले 1894 में वन नीति बनाई गई और अपनाई गई। आजादी के बाद सन् 1952 में घोषित नई वन नीति के तहत भूमि के 33 प्रतिशत भाग में वन होने चाहिए। हमारे देश में सन् 1988 में नई नीति बनाई गई। उसके तीन उद्देश्य का वर्णन किया गया - प्रर्यावरण स्थिरता, वनस्पति व जीव - जंतुओं जैसी प्राकृतिक धरोहर को संजोकर रखना और जन सामान्य की बुनियादी आवश्यकताओं की पूर्ति करना।

सरकार द्वारा अनेकों वन संरक्षण योजनाएं बनाई गई हैं। सामाजिक वानिकी योजना, राष्ट्रीय अभयारण्य व पार्कों की स्थापना आदि इस दिशा में महत्वपूर्ण प्रयास हैं ।वन क्षेत्रों के विस्तार और मरुस्थल के प्रसार को नियंत्रित करने के लिए वन अनुसंधान केंद्र देहरादून और केंद्रीय मरु वन क्षेत्र अनुसंधान जोधपुर द्वारा प्रयास जारी किया गया है।

 सरकार सरकार द्वारा वन विकास के लिए सामाजिक वानिकी, अरावली वृक्षारोपण एवं वन संरक्षण कार्यक्रम पर विभिन्न प्रकार के वानिकी श्रंखलाएँ हैं। जैसे कि - वृक्ष मित्र श्रद्धा, वानिकी पंडित उपा इत्यादि।

हमारे देश में वन्य जीवों के संरक्षण के लिए 15 जीव मण्डल निकाय स्थापित किए गए हैं: - सुंदर वन, नोकरेक, मन्नार खाड़ी, नंदा देवी, मानस, नीलगिरि, सिमलीपाल, थार का मरुस्थल, नामदफा, उत्तराखंड, कच्छ का छोटा रण, कान्हा। काजिरंगा, उत्तरी अंडमान व निकोबार।

        राजस्थान राज्य के वन्य जीव संरक्षण के लिए अभयारण्य -: जंगल में रहने वाले जीव जंतुओं को वन्य जीव कहते हैं reg में प्रमुखत: सांभर, चीतल नीलगाय, बघेरा, बाघ, काले हिरण चिंकारा, भेड़, सियार, रेछ, लोमड़ी आदि पाए जाते हैं। । संरक्षित राज्य का राज्य पशु चिंकारा है राज्य में खुलता है २२ (संरक्षित वन क्षेत्र) वन्य जीव अभयारण्य हैं। केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान घना पक्षी विहार भरतपुर और रणथंभौर राष्ट्रीय उद्यान सवाई माधोपुर राजस्थान के राष्ट्रीय उद्यान है राष्ट्रीय मरू उद्यान बाड़मेर जैसलमेर राष्ट्रीय उद्यान सरिस्का अलवर। जोधपुर में अमृता देवी कृष्ण मृग अभयारण्य बनाया गया है।